
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में गंगा स्नान के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ लिखे जाने पर प्रशासन द्वारा स्पष्टीकरण मांगे जाने का मामला अब गंभीर रूप लेता जा रहा है। इस घटना को लेकर संत समाज में गहरा आक्रोश है। इसी कड़ी में मंगलवार को हरिद्वार की हरकी पैड़ी पर साधु-संतों ने जोरदार प्रदर्शन कर प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जाहिर की।
प्रदर्शन कर रहे संतों ने आरोप लगाया कि प्रयागराज में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ प्रशासन ने अभद्र और अमर्यादित व्यवहार किया। संत समाज ने इसे सनातन परंपरा, धार्मिक आस्था और संत मर्यादा पर सीधा आघात करार दिया। संतों का कहना था कि यह कोई साधारण प्रशासनिक मामला नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और संत परंपरा से जुड़ा विषय है।
‘शंकराचार्य कौन होगा, यह प्रशासन तय नहीं कर सकता’
भारत साधु समाज के राष्ट्रीय संगठन मंत्री स्वामी प्रबोधानंद गिरी ने कहा कि शंकराचार्य कौन होगा, यह किसी अधिकारी या प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यह निर्णय संत समाज और जनआस्था से होता है। उन्होंने प्रयागराज की घटना को निंदनीय बताते हुए कहा कि अब तक शंकराचार्य से सार्वजनिक रूप से माफी न मांगा जाना गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने मांग की कि योगी सरकार का कोई प्रतिनिधिमंडल या अधिकृत प्रतिनिधि शीघ्र शंकराचार्य से मुलाकात कर सार्वजनिक माफी मांगे। स्वामी प्रबोधानंद गिरी ने कहा कि संत समाज टकराव नहीं, बल्कि संवाद में विश्वास रखता है और समय रहते बातचीत से समाधान निकाला जाना चाहिए।
ब्राह्मण समाज ने खोली शिखा, आंदोलन तेज करने की चेतावनी
वहीं, श्री अखंड परशुराम अखाड़े के अध्यक्ष पंडित अधीर कौशिक ने कहा कि शंकराचार्य और उनके शिष्यों के साथ किया गया व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। विरोध के प्रतीक स्वरूप ब्राह्मण समाज ने अपनी शिखा खोल दी, जो आक्रोश और अपमान का प्रतीक माना जाता है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि जब तक प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगता, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा। यदि प्रशासन अपनी हठधर्मिता पर कायम रहा, तो संत समाज आंदोलन को और व्यापक व उग्र रूप देने के लिए बाध्य होगा।
बढ़ता संत समाज का आक्रोश
हरकी पैड़ी पर हुए इस प्रदर्शन के बाद साफ संकेत मिल रहे हैं कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया, तो यह मुद्दा राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर संत समाज के बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। संतों ने स्पष्ट किया कि सनातन परंपरा और शंकराचार्य पद की मर्यादा से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।