
नई दिल्ली।
आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर की गई टिप्पणियों को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी फटकार का सामना करना पड़ा। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मेनका गांधी की टिप्पणियां अदालत की अवमानना की श्रेणी में आती हैं। हालांकि, न्यायालय ने उदारता का परिचय देते हुए उनके खिलाफ फिलहाल अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं करने का निर्णय लिया।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान नाराज़गी जताते हुए कहा कि मेनका गांधी ने बिना सोचे-समझे हर किसी के खिलाफ टिप्पणियां की हैं। पीठ ने उनकी ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से तीखे सवाल करते हुए कहा, “क्या आपने यह जानने की कोशिश की कि आपकी मुवक्किल किस तरह की टिप्पणियां कर रही हैं? क्या आपने उनका पॉडकास्ट सुना है, उनकी बॉडी लैंग्वेज देखी है—वह क्या कहती हैं और किस लहजे में कहती हैं?”
न्यायालय ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा, “आपकी मुवक्किल ने अदालत की अवमानना की है। लेकिन न्यायालय की उदारता के कारण हम इस पर संज्ञान नहीं ले रहे हैं।”
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि यह अवमानना का मामला नहीं है और राजनेता अक्सर इस तरह के बयान देते रहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह पहले 2008 मुंबई आतंकी हमले के दोषी अजमल कसाब की ओर से भी पेश हो चुके हैं और इस मामले में केवल अपनी मुवक्किल की दलीलें रख रहे हैं। इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने सख्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “अजमल कसाब ने कभी अदालत की अवमानना नहीं की थी, लेकिन आपकी मुवक्किल ने की है।” इस टिप्पणी ने अदालत की गंभीरता को और रेखांकित कर दिया।
‘कुत्तों से नसबंदी प्रमाणपत्र नहीं मांग सकते’
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि कुछ शहरों में कुत्तों की नसबंदी योजना प्रभावी नहीं रही है, जबकि लखनऊ और गोवा जैसे शहरों में यह सफल रही। इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि अदालत कुत्तों से ‘नसबंदी प्रमाणपत्र’ पेश करने को नहीं कह सकती।
प्रशांत भूषण ने यह भी उल्लेख किया कि पिछली सुनवाई में अदालत ने कुत्तों को खाना खिलाने वालों को काटने की घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराने की टिप्पणी की थी। इस पर जस्टिस नाथ ने स्पष्ट किया कि वह टिप्पणी व्यंग्यात्मक नहीं, बल्कि पूरी गंभीरता के साथ की गई थी।
मामले में अब अगली सुनवाई 28 जनवरी को निर्धारित की गई है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल सार्वजनिक बयानबाजी की मर्यादा पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि न्यायालय के आदेशों और गरिमा पर टिप्पणी करने में संयम आवश्यक है।