Wednesday, January 21

ज्योतिष पीठ शंकराचार्य विवाद: अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वरूपानंद की नियुक्ति पर भी था मतभेद माघ मेले में स्नान रोकने पर बढ़ा विवाद, सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला

वाराणसी। माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के स्नान नहीं करने देने की घटना ने फिर से ज्योतिष पीठ शंकराचार्य को लेकर विवाद को तूल दे दिया है। इसको लेकर सवाल उठ रहे हैं कि अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने नाम के साथ ‘शंकराचार्य’ उपाधि क्यों लगाई, जबकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

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ज्योतिष पीठ, जो काशी से सीधे जुड़ा हुआ मठ है, आदि शंकराचार्य की अद्वैत परंपरा का हिस्सा है। पीठ का शंकराचार्य बनने को लेकर वर्षों से विवाद चल रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वरूपानंद सरस्वती के शंकराचार्य बनने पर भी विवाद था।

 

इतिहास और चयन प्रक्रिया

1941 में स्वामी ज्ञानानंद ने काशी में लुप्त ज्योतिष पीठ की खोज की और शास्त्रार्थ के माध्यम से पहले शंकराचार्य का चयन किया। इसके बाद कई शंकराचार्यों का नामांकन हुआ, लेकिन अदालतों में कई बार उनका चयन अमान्य ठहराया गया। 25 जून 1953 को स्वामी कृष्णबोधाश्रम का अभिषेक हुआ और उनके बाद स्वरूपानंद सरस्वती को शंकराचार्य घोषित किया गया।

 

हालांकि, 2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्वामी स्वरूपानंद और स्वामी वासुदेवानंद के शंकराचार्य बनने के दावों को खारिज कर दिया। अदालत ने चयन प्रक्रिया पूरी करने की जिम्मेदारी भारत धर्म मंडल, काशी विद्वत परिषद और अन्य पीठों को दी थी। लेकिन भारत धर्म महामंडल के एक गुट ने स्वामी स्वरूपानंद का नाम प्रस्तावित कर अभिषेक कर दिया, जिससे विवाद और बढ़ गया।

 

मठाम्नाय ग्रंथ और शासकीय नियम

बीएचयू के ज्योतिष विभाग के पूर्व हेड विनय कुमार पांडेय के अनुसार, मठाम्नाय अनुशासन ग्रंथ गुरु-शिष्य परंपरा के आधार पर शंकराचार्य की नियुक्ति करता है। इसमें योग्यता, नियुक्ति, शासन और हटाने के नियम स्पष्ट हैं।

 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनके गुरु स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद 11 सितंबर 2022 को शंकराचार्य घोषित किया गया था। गुरु की वसीयत के अनुसार निजी सचिव और शिष्य ने यह घोषणा की। हालांकि, निरंजनी अखाड़ा और गोवर्धन मठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने इस नियुक्ति का समर्थन नहीं किया।

 

माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान रोकने और बटुकों की चोटी पकड़ने वाले वीडियो के बाद साधु-संतों में गुस्सा बढ़ा है। वहीं, प्रशासन ने नोटिस जारी कर सवाल उठाया है कि ‘शंकराचार्य’ की उपाधि का प्रयोग क्यों किया जा रहा है। मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और न्यायालय के निर्णय का इंतजार है।

 

इस विवाद ने धार्मिक और न्यायिक दोनों ही दृष्टियों से ज्योतिष पीठ की साख और चयन प्रक्रिया पर नई बहस को जन्म दिया है।

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