
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सड़क दुर्घटनाएं केवल मानवीय त्रासदी नहीं, बल्कि व्यवस्था की बड़ी विफलता का आईना बन चुकी हैं। वर्ष 2024 में प्रदेश में 46 हजार से अधिक सड़क हादसे हुए, जिनमें 24 हजार से ज्यादा लोगों की जान चली गई। चौंकाने वाली बात यह है कि इन सभी मामलों की जांच में दोष केवल ड्राइवरों पर मढ़ दिया गया, जबकि सड़क निर्माण, रखरखाव और वाहन फिटनेस से जुड़ी अथॉरिटी और विभाग पूरी तरह बचते रहे।
यही हमारी जांच व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी है। हर हादसे में ओवरस्पीडिंग, लापरवाही या चालक की गलती लिखकर रिपोर्ट बंद कर दी जाती है। नतीजा यह कि दुर्घटनाओं के असली कारणों तक पहुंच ही नहीं हो पाती और सुधार की कोई ठोस पहल नहीं हो पाती।
ये गंभीर बातें मंगलवार को इंस्टिट्यूट ऑफ रोड ट्रैफिक एजुकेशन (IRTE) के प्रेजिडेंट और कॉलेज ऑफ ट्रैफिक मैनेजमेंट एंड फॉरेंसिक साइंस के डायरेक्टर डॉ. रोहित बालुजा ने कहीं। वह लोक निर्माण विभाग (PWD) के विश्वेश्वरैया हॉल में IRTE द्वारा प्रदेशभर के आरटीओ के लिए आयोजित सड़क सुरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम में बोल रहे थे।
डॉ. बालुजा ने कहा कि हादसों की जांच में ड्राइवरों की कार्य परिस्थितियों को लगभग नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई बार चालकों को 14 से 18 घंटे तक लगातार गाड़ी चलानी पड़ती है। डबल क्रू की व्यवस्था नहीं होती, पर्याप्त आराम नहीं मिलता। सीटें तक मानकों के अनुरूप नहीं होतीं। बसों में वाइपर नहीं, विंडस्क्रीन टूटी होती है।
सरकारी बसों के संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी खामियों वाली बसों को सड़क पर उतारने की अनुमति आखिर कौन देता है? नियम स्पष्ट कहते हैं कि सरकारी बसों को पूरी तकनीकी जांच के बाद ही चलाया जाना चाहिए। फिर खराब टायर, टूटे शीशे और अन्य खामियों के साथ बसें कैसे दौड़ रही हैं? और जब हादसा होता है, तो सारा दोष मृत या जीवित ड्राइवर पर डालकर मामला खत्म कर दिया जाता है।
मनमानी रिपोर्ट, सच्चाई से दूरी
डॉ. बालुजा ने हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले की एक बस दुर्घटना का उदाहरण दिया, जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई थी। पुलिस जांच में ड्राइवर को तेज रफ्तार का दोषी बताया गया। IRTE की स्वतंत्र जांच में सामने आया कि हादसे वाली जगह पर तीखा मोड़ था, सड़क की चौड़ाई मात्र चार मीटर थी और ठीक बगल में गहरी खाई थी। वहां न तो चेतावनी संकेत थे, न ही सामने से आने वाले वाहन को देखने की कोई व्यवस्था। साफ था कि गलती सड़क बनाने वाली अथॉरिटी की थी, लेकिन उसे जांच में शामिल ही नहीं किया गया।
उन्होंने बताया कि एक मामले में दुर्घटना में घायल एक लड़की ने पुलिस को बताया था कि ड्राइवर आराम से बस चला रहा था और सामने से अचानक वाहन आ जाने के कारण हादसा हुआ। लेकिन यह बयान जांच रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया, क्योंकि ऐसा करने से जांच आगे बढ़ जाती। ड्राइवर की मौत हो चुकी थी, उसी पर आरोप डालकर केस निपटा दिया गया।
स्कूली बस हादसा और सिस्टम की चुप्पी
हिमाचल प्रदेश में ही एक स्कूली बस 300 मीटर गहरी खाई में गिर गई, जिसमें 29 मासूम बच्चों की जान चली गई। इस मामले में भी पुलिस ने ड्राइवर को दोषी ठहराकर केस रफा-दफा कर दिया। IRTE की जांच में पाया गया कि सड़क की चौड़ाई पौने तीन मीटर थी, जबकि दो वाहनों के आमने-सामने गुजरने के लिए न्यूनतम तीन मीटर प्रति लेन जरूरी है। पहाड़ी इलाकों में जोखिम अधिक होता है, ऐसे में साइनेज, सेफ्टी मिरर और अन्य सुरक्षा इंतजाम करना सड़क निर्माण एजेंसियों की जिम्मेदारी है, जो पूरी नहीं की गई।
डॉ. बालुजा ने जयपुर और मथुरा के हादसों का जिक्र करते हुए कहा कि हाईवे पर गलत ढंग से बनाए गए कट, अपर्याप्त चौड़ाई और खराब डिजाइन भी बड़े हादसों की वजह बनते हैं, लेकिन प्राथमिक जांच में इन पहलुओं को लगभग नजरअंदाज कर दिया जाता है।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा,
“हमें जिम्मेदारी तय करनी होगी। सड़क दुर्घटनाओं की जांच को गंभीरता से लेना होगा। सिर्फ ड्राइवर को दोषी ठहराने से न तो मौतें रुकेंगी, न ही व्यवस्था सुधरेगी। एक भी मौत हमारे लिए बहुत बड़ी है।”
सवाल साफ है—क्या सड़क हादसों की असली वजहों पर कभी ईमानदारी से जांच होगी, या फिर हर बार ड्राइवर ही सिस्टम की नाकामी का बलि का बकरा बनता रहेगा?