
नई दिल्ली (अवधेश कुमार):
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से खुलकर कहते रहे हैं कि वे ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते हैं। यह क्षेत्र डेनमार्क का सेल्फ-रूलिंग इलाका है, लेकिन ट्रंप ने हाल ही में डेनमार्क और यूरोपीय सहयोगियों को सीधे तौर पर चेतावनी दी है।
विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप बिना योजना और रणनीति के कोई कदम नहीं उठाते। जब 20 जनवरी, 2025 को उन्होंने राष्ट्रपति पद संभाला, तब उनके कई बयान हल्के में लिए गए और मजाक का विषय बने। लेकिन अब यह साफ हो गया है कि उनके बयानों को नजरअंदाज करना खतरनाक होगा।
ग्रीनलैंड पर नजर:
वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अमेरिका लाने के बाद, विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी प्रभाव बढ़ना लगभग तय है। यदि ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल कर लेते हैं, तो आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका का सामरिक और खनिज संसाधनों पर प्रभुत्व मजबूत होगा, और चीन और रूस के लिए यह क्षेत्र पर आधिपत्य जमाना कठिन हो जाएगा।
विदेश नीति में बदलाव:
ट्रंप ने ईरान और अन्य देशों के साथ अमेरिकी रुख को कड़ा किया है। उनका मानना है कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। यह दृष्टिकोण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से चली आ रही अमेरिकी नीति की तुलना में अधिक आक्रामक और निर्णायक है।
अमेरिका का वैश्विक प्रभुत्व:
ट्रंप के कदमों से वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संस्थाएं कई मामलों में अप्रभावी प्रतीत हो रही हैं। ट्रंप अमेरिका को वैश्विक स्तर पर एक शक्तिशाली और प्रभुत्वशाली राष्ट्र के रूप में देखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
नाटो और सुरक्षा:
अमेरिका ने हमेशा नाटो देशों के साथ अपने पारंपरिक संबंध बनाए रखे हैं। ट्रंप की नीति यह सुनिश्चित करती है कि अमेरिका अपनी शक्ति और दृष्टिकोण के अनुसार ही अंतरराष्ट्रीय संगठन और गठबंधनों का संचालन करे।
राष्ट्रहित पर जोर:
ट्रंप के आक्रामक रुख के विरोध में भी अमेरिका में कई लोग हैं। बावजूद इसके, उन्हें अमेरिका की सामरिक और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने, और विश्व व्यवस्था में अमेरिका के प्रभुत्व को स्थापित करने वाला नेता माना जाएगा।