
नई दिल्ली।
सोने की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है और इसका असर आम खरीदारों के साथ निवेशकों पर भी दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तेजी का एक बड़ा कारण भारत और चीन हैं, जिनके केंद्रीय बैंकों ने सोने की खरीद में वृद्धि की है।
केंद्रीय बैंकों की भूमिका
दुनिया भर के केंद्रीय बैंक आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के समय सोने को सुरक्षित संपत्ति मानते हैं। हाल के आंकड़ों से पता चला है कि अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में निवेश कम करने के बाद भारत और चीन ने सोने में अपना हिस्सा बढ़ाया है। यह सिर्फ पोर्टफोलियो में अस्थायी बदलाव नहीं, बल्कि रिजर्व प्रबंधन की रणनीति में बड़ा परिवर्तन है।
आरबीआई की रणनीति
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में बदलाव आरबीआई की सोची–समझी नीति का परिणाम है। अक्टूबर 2025 तक भारत का अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश 200 अरब डॉलर से घटकर करीब 190 अरब डॉलर हो गया, यानी पिछले साल के मुकाबले 50.7 अरब डॉलर की बड़ी गिरावट। वहीं, सोने का भंडार बढ़कर 880.18 मीट्रिक टन हो गया, जो पिछले साल 866.8 मीट्रिक टन था। यह दर्शाता है कि भंडार की कुल मात्रा लगभग स्थिर रहते हुए सोने का हिस्सा बढ़ाया गया है।
सोने का बढ़ता महत्व
आरबीआई के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा अब 13.6% हो गया है, जो पिछले साल 9.3% था। यह बदलाव दर्शाता है कि सोना अब भारत की रिजर्व रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है, न कि कोई मामूली संपत्ति।
चीन और अन्य देशों की स्थिति
चीन ने अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश घटाया है, जो राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील माना जा रहा है। नवंबर 2025 में चीन का निवेश घटकर 682.6 अरब डॉलर हो गया। वहीं, जापान, यूके, बेल्जियम, फ्रांस और यूएई ने अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश बढ़ाया है। चीन के पास दिसंबर 2025 तक दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार था, कुल 3.3579 ट्रिलियन डॉलर।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत और चीन की रणनीतिक सोने की खरीद और अमेरिकी ट्रेजरी से निवेश की कटौती ने सोने की कीमतों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह प्रवृत्ति आने वाले समय में भी जारी रहने की संभावना है।