
अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान पर सैन्य हमले की संभावना को कम किया। इससे बाजार में डर कम हुआ और तेल की कीमतें नीचे आईं।
आपूर्ति मांग से अधिक है:
गोल्डमैन सैक्स और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का कहना है कि 2026 में वैश्विक तेल की आपूर्ति बढ़ रही है, जिससे कीमतों में गिरावट आ रही है।
ओपेक की उत्पादन कटौती नहीं:
2022 में कीमतों को स्थिर करने के लिए लागू कटौती अब नहीं हो रही।
वेनेजुएला और कजाकिस्तान की आपूर्ति:
अमेरिका ने वेनेजुएला का तेल बेचकर सप्लाई बढ़ाई, जबकि कजाकिस्तान में उत्पादन में गिरावट आई है, लेकिन कुल आपूर्ति अभी भी मजबूत बनी हुई है।
भू-राजनीतिक घटनाएं:
ड्रोन हमले, रूस और यूरोपीय संघ की मूल्य सीमाएं जैसी घटनाएं कीमतों पर दबाव डाल रही हैं, लेकिन कुल मिलाकर अतिरिक्त आपूर्ति की कहानी हावी है।
2️⃣ भारत के लिए फायदे
तेल आयात कम महंगा होगा:
भारत अपनी जरूरत का लगभग 88–85% तेल आयात करता है। कीमतें कम होने से आयात बिल घटेगा।
रुपया मजबूत होगा:
कम आयात बिल के कारण डॉलर की मांग कम होगी, जिससे रुपया स्थिर या मजबूत रहेगा।
महंगाई पर नियंत्रण:
पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होने से गृहस्थी और रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम कम होंगे।
सरकारी खर्च में वृद्धि:
कम कीमतें सरकार को बुनियादी ढांचे और विकास योजनाओं पर ज्यादा खर्च करने का मौका देती हैं।
औद्योगिक लागत घटेगी:
परिवहन, एयरलाइन, पेंट और टायर जैसी उद्योगों की लागत में कमी आएगी।
3️⃣ सप्लाई और डिमांड का असर
वैश्विक तेल भंडार बढ़ने और अतिरिक्त आपूर्ति के कारण तेल का बाजार संतुलन नीचे की ओर है।
जब तक ओपेक उत्पादन कटौती नहीं करता या कोई बड़ी आपूर्ति बाधा नहीं आती, कीमतें कम बनी रहेंगी।
✅ निष्कर्ष:
चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध हो या ईरान संकट, फिलहाल कोई भी फैक्टर तेल की गिरावट को रोक नहीं पाया है। यह भारत के लिए एक आर्थिक वरदान साबित हो रहा है, क्योंकि यह महंगाई कम करने, रुपया मजबूत करने और सरकारी बजट बढ़ाने में मदद करता है।
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