Thursday, June 18

This slideshow requires JavaScript.

कार की पिछली सीट बना ‘न्याय का मंदिर’ मधुबनी की अनीता झा 13 वर्षों से दे रही हैं संघर्ष, स्वाभिमान और संकल्प की मिसाल

मधुबनी।
जहां सुविधाओं के अभाव में कई लोग अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं, वहीं बिहार के मधुबनी की वरिष्ठ अधिवक्ता अनीता झा ने अभाव को ही अपनी ताकत बना लिया। पिछले 13 वर्षों से वह जिला अदालत परिसर में खड़ी अपनी कार की पिछली सीट को ही चैंबर बनाकर वकालत कर रही हैं। यह कार आज सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि उनके लिए न्याय का मंदिर बन चुकी है।

This slideshow requires JavaScript.

मधुबनी जिला अदालत के परिसर में हर सुबह करीब 10:30 बजे एक सफेद कार आकर अपनी तय जगह पर खड़ी होती है। दिनभर वहीं बैठकर 57 वर्षीय अनीता झा अपने मुवक्किलों से मिलती हैं, मामलों की सुनवाई की तैयारी करती हैं, कानूनी सलाह देती हैं और दस्तावेज तैयार करती हैं। कड़ाके की ठंड हो या भीषण गर्मी, सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक उनकी यही कार उनका कार्यालय रहती है।

मजबूरी को बनाया अवसर

डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू करने के बाद जब अनीता झा को चैंबर आवंटित नहीं हो सका, तो उन्होंने व्यवस्था को कोसने के बजाय एक अनोखा और साहसिक रास्ता चुना। उन्होंने अपनी कार को ही कार्यालय में बदल दिया। कोर्ट परिसर में जेल वैन के पास खड़ी उनकी कार आज वर्षों से उसी स्थान पर दिखाई देती है, जहां से वे कानून की लड़ाई लड़ती आ रही हैं।

भरोसे की पहचान बनी सफेद कार

अनीता झा के काम करने के तरीके ने कभी उनके मुवक्किलों के भरोसे को कम नहीं किया। कोर्ट परिसर की भीड़ और लगातार बदलते मौसम के बावजूद उनकी दिनचर्या अडिग रही। आज उनकी यह सफेद कार मधुबनी कोर्ट का एक जाना-पहचाना लैंडमार्क बन चुकी है। दूर-दराज से आने वाले लोग भी “सफेद कार वाली वकील साहिबा” के नाम से उन्हें पहचानते हैं।

20 हजार से अधिक मामलों का निपटारा

1968 में जन्मी अनीता झा को कानून की राह उनके पिता ने दिखाई, जो स्वयं अदालत में कार्यरत थे। उन्होंने 1989 में एलएलबी की पढ़ाई शुरू की और उस समय अपने बैच की इकलौती महिला थीं। अब तक अपने करियर में वह करीब 20 हजार मामलों का निपटारा कर चुकी हैं। वर्तमान में वे पोक्सो एक्ट, दहेज उत्पीड़न और वैवाहिक विवादों के मामलों में विशेष रूप से जानी जाती हैं।

संघर्ष से बनी पहचान

अनीता झा की कहानी केवल एक वकील की नहीं, बल्कि हिम्मत, आत्मसम्मान और अटूट इच्छाशक्ति की कहानी है। उन्होंने साबित कर दिया कि संसाधन नहीं, बल्कि संकल्प व्यक्ति को आगे बढ़ाता है। कार की पिछली सीट से न्याय की मशाल जलाए रखने वाली अनीता झा आज समाज के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं—यह दिखाने के लिए कि हालात चाहे जैसे हों, अगर इरादे मजबूत हों तो रास्ते खुद बन जाते हैं।

 

Leave a Reply