
अब बैंक और डेवलपर के बीच दिवालियापन प्रक्रिया में RWA या सोसायटी नहीं कर सकेंगी दखल; कोर्ट ने दिशानिर्देशों के साथ पारदर्शिता भी बढ़ाने का दिया निर्देशनई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट क्षेत्र में दिवालियापन कानून (IBC) पर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि जब कोई बैंक या वित्तीय संस्था किसी डेवलपर के खिलाफ सेक्शन-7 के तहत दिवालियापन कार्यवाही शुरू करती है, तो रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) या कोई भी सोसायटी इस प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती। यह मामला केवल लेनदार और कर्जदार के बीच का होता है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने स्पष्ट किया कि RWA तब तक वित्तीय लेनदार नहीं माना जाएगा जब तक कि उसने खुद कर्ज न दिया हो या कानून द्वारा खरीदारों का अधिकृत प्रतिनिधि न बनाया गया हो। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि आरडब्ल्यूए को शुरुआत में दखल देने की अनुमति दी गई, तो डेवलपर अपनी समस्याओं को टालने के लिए सामूहिक हितों का बहाना बना सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सेक्शन-7 के तहत कार्यवाही व्यक्तिगत रहती है और घर खरीदारों का सामूहिक प्रतिनिधित्व केवल प्रक्रिया शुरू होने के बाद अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से किया जाएगा।
कोर्ट ने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए हैं। इसमें सभी अलॉटियों का पूरा विवरण सूचना ज्ञापन में देना, कब्जा नहीं दिए जाने पर CoC द्वारा लिखित कारण दर्ज करना, और परिसमापन की सिफारिश के लिए ठोस औचित्य प्रस्तुत करना शामिल है।
यह फैसला गुजरात के अहमदाबाद स्थित ‘तक्षशिला एलेगना’ परियोजना से जुड़ा है। डेवलपर ने ईसीएल फाइनेंस लिमिटेड से करीब 70 करोड़ रुपये का ऋण लिया था, जो बाद में एडेलवाइस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (EARCL) को ट्रांसफर हुआ। IBC की धारा-7 के तहत दिवालियापन प्रक्रिया शुरू की गई, जिसे एनसीएलटी ने खारिज किया था। इसके बाद एनसीएलएटी ने CIRP शुरू करने का आदेश दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले से RWA की सीधी दखलंदाजी सीमित होगी, लेकिन घर खरीदारों के हित IBC के तहत पूरी तरह सुरक्षित हैं।