
वॉशिंगटन/मॉस्को, 16 जनवरी 2026: आर्कटिक में तेजी से बर्फ पिघलने के साथ ही ग्रीनलैंड ने वैश्विक शक्ति संघर्ष का नया केंद्र बन गया है। पिघलती बर्फ से नये समुद्री मार्ग बन रहे हैं, जो जहाजों की यात्रा के समय को आधे से भी कम कर सकते हैं। ऐसे मार्गों पर नियंत्रण रखने वाला देश दुनिया की सप्लाई चेन पर प्रभुत्व कायम कर सकेगा।
ग्रीनलैंड क्यों बन गया रणनीतिक महत्व का केंद्र
जलवायु परिवर्तन की वजह से ग्रीनलैंड की विशाल बर्फ की चादर तेजी से पिघल रही है। पिछले 40 साल में लगभग 27 प्रतिशत बर्फ गायब हो चुकी है, जो लीबिया के क्षेत्रफल के बराबर है। इससे आर्कटिक में नये शिपिंग लेन बनने लगे हैं। सबसे प्रमुख है उत्तरी समुद्री रास्ता, जो यूरोप से एशिया तक रूस के आर्कटिक तट के पास होकर जाता है। इसके अलावा उत्तर-पश्चिमी और केंद्रीय आर्कटिक रास्तों की संभावनाएं भी बन रही हैं।
सुपरपावर्स की बढ़ती दिलचस्पी
अमेरिका, रूस और चीन ग्रीनलैंड के इस नए रणनीतिक महत्व को लेकर सक्रिय हो गए हैं। अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में मिलिट्री बेस रखता है, जैसे पिटुफिक बेस, जो मिसाइल चेतावनी, मिसाइल डिफेंस और स्पेस ऑपरेशन का काम करता है। रूस ने पिछले एक दशक में कई आर्कटिक बेस खोले और पुराने सोवियत इंफ्रास्ट्रक्चर को फिर से सक्रिय किया। चीन ने 2016 में खुद को आर्कटिक का “करीबी देश” घोषित किया और आइसब्रेकिंग जहाजों को तैनात किया।
नए शिपिंग मार्ग और ग्लोबल ट्रेड
पिघलती बर्फ ने ग्रीनलैंड के रास्तों को स्वेज नहर के विकल्प के रूप में उभारा है। 2025 में “पोलर सिल्क रोड” के माध्यम से चीन से यूरोप तक कंटेनर शिप की पहली यात्रा 20 दिनों में पूरी हुई। मरीन एक्सचेंज ऑफ अलास्का के डेटा के अनुसार, 2024 में बेरिंग स्ट्रेट से 665 जहाज गुज़रे, जो 2010 के 242 जहाजों की तुलना में 175% ज्यादा हैं।
दुर्लभ खनिजों के भंडार
ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिजों का विशाल भंडार मौजूद है। US जियोलॉजिकल सर्वे के अनुसार, यहां 1.5 मिलियन टन से अधिक दुर्लभ खनिज हैं। क्वानफेल्ड और टैनब्रीज जैसे क्षेत्र विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गए हैं। चीन की शेंघे रिसोर्सेज क्वानफेल्ड प्रोजेक्ट में सबसे बड़ी शेयरहोल्डर है। बर्फ के पिघलने से खनिजों तक पहुंच आसान होती जा रही है, जिससे ग्रीनलैंड का भू-राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे आर्कटिक में बर्फ कम होगी और समुद्री मार्ग खुलेंगे, अमेरिका, रूस और चीन के बीच “ग्रेट गेम” और तेज होगा। भविष्य में यह क्षेत्र वैश्विक सामरिक और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का अहम मैदान बन सकता है।