
पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर एक नई ‘डिफेंस डॉक्ट्रिन’ के जरिए पाकिस्तान को इस्लामिक देशों के बीच रणनीतिक नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। इस नीति के तहत पाकिस्तान खुद को मुस्लिम देशों का ‘रक्षक’ और सैन्य सुरक्षा प्रदाता के रूप में पेश कर रहा है। हथियारों की बिक्री, सैन्य प्रशिक्षण और रणनीतिक सहयोग इसी योजना का हिस्सा बताए जा रहे हैं।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक इंडोनेशिया, अजरबैजान, सूडान, लीबिया, सऊदी अरब और बांग्लादेश जैसे देश पाकिस्तानी और चीनी साझेदारी से बने JF‑17 लड़ाकू विमान में रुचि दिखा रहे हैं। हालांकि पाकिस्तान के ही कई रक्षा विशेषज्ञों ने इन दावों को बढ़ा‑चढ़ाकर पेश किया गया प्रचार बताया है और कहा है कि इन खबरों के पीछे पाकिस्तानी सेना का मनोवैज्ञानिक अभियान हो सकता है।
हथियारों की आड़ में भू‑राजनीतिक खेल
भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि यह केवल हथियार निर्यात का मामला नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक भू‑राजनीतिक रणनीति है। असीम मुनीर की योजना मुस्लिम देशों में पाकिस्तान की सैन्य निर्भरता बढ़ाकर उसे एक स्व‑घोषित नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने की है, खासकर ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया और अफ्रीका के कई हिस्से अस्थिरता से जूझ रहे हैं।
‘परमाणु छतरी’ का भ्रम
खुफिया सूत्रों के अनुसार कुछ मुस्लिम देश क्षेत्रीय खतरों के बीच पाकिस्तान की तथाकथित ‘परमाणु छतरी’ में आने की इच्छा भी जता रहे हैं। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हालिया रक्षा समझौते को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पाकिस्तान न तो परमाणु हथियार किसी को दे सकता है और न ही किसी अन्य देश में उन्हें तैनात कर सकता है। इसके बावजूद रणनीतिक गारंटी का संकेत देना कई सवाल खड़े करता है।
दावों की हकीकत
पाकिस्तान सरकार का दावा है कि उसने वित्त वर्ष 2025‑26 में 8 अरब डॉलर के रक्षा निर्यात ऑर्डर हासिल किए हैं और अगले कुछ वर्षों में 20 अरब डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि JF‑17 कार्यक्रम में चीन की हिस्सेदारी करीब 65 प्रतिशत है, ऐसे में वास्तविक मुनाफे का बड़ा हिस्सा बीजिंग को ही जाएगा।
भारत के लिए क्या मायने?
भारतीय एजेंसियों के अनुसार असीम मुनीर की यह नीति दक्षिण एशिया और इस्लामिक दुनिया में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है। पाकिस्तान यदि खुद को मुस्लिम देशों का सैन्य संरक्षक बताने में सफल होता है, तो यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक और वैचारिक चुनौती भी बन सकती है।
निष्कर्षतः, पाकिस्तान की यह पहल सैन्य सौदों से कहीं आगे जाकर क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित करने का प्रयास है। सवाल यह है कि क्या यह वास्तविक क्षमता पर आधारित है या केवल प्रचार और शक्ति‑प्रदर्शन की रणनीति।