
प्रयागराज। पत्नी को गुजारा भत्ता दिए जाने को लेकर लंबे समय से चल रही बहस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि पत्नी को पति की कुल आय का अधिकतम 25 प्रतिशत तक गुजारा भत्ता दिया जा सकता है। यह फैसला भविष्य में तलाक और भरण-पोषण से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने शाहजहांपुर के एक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामला पति सुरेश चंद्र की उस पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने फैमिली कोर्ट द्वारा गुजारा भत्ता बढ़ाए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।
क्या है पूरा मामला
शाहजहांपुर फैमिली कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 127 के तहत पत्नी को मिलने वाले भरण-पोषण को 500 रुपये प्रतिमाह से बढ़ाकर 3000 रुपये प्रतिमाह कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ पति ने हाई कोर्ट का रुख किया।
मजदूर होने का दिया तर्क
याचिकाकर्ता सुरेश चंद्र ने अदालत में दलील दी कि वह एक मजदूर है और उसकी आय बेहद सीमित है। उसने कहा कि पहले ही गुजारा भत्ता कई बार बढ़ाया जा चुका है और छठी बार बढ़ोतरी करना अन्यायपूर्ण है। साथ ही आरोप लगाया कि फैमिली कोर्ट ने सभी तथ्यों पर गंभीरता से विचार नहीं किया।
सरकार की दलील
सरकारी वकील ने कोर्ट के सामने तर्क रखा कि मौजूदा महंगाई के दौर में 3000 रुपये प्रतिमाह की राशि अत्यधिक नहीं कही जा सकती। यह राशि पत्नी के न्यूनतम जीवन-यापन के लिए आवश्यक है और पति की आय के अनुपात में भी उचित है।
हाई कोर्ट का अहम निर्णय
सभी पक्षों को सुनने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी को गुजारा भत्ता देना पति की कानूनी जिम्मेदारी है। हालांकि, यह राशि पति की आय के 25 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसी सीमा के भीतर भरण-पोषण तय किया जाना न्यायसंगत होगा।
क्यों है यह फैसला अहम
यह निर्णय न केवल संबंधित मामले में मार्गदर्शक साबित होगा, बल्कि देशभर में गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में एक संतुलित मानक स्थापित करेगा। इससे न तो पति पर अत्यधिक आर्थिक बोझ पड़ेगा और न ही पत्नी के अधिकारों की अनदेखी होगी।