
लद्दाख की शक्सगाम घाटी को लेकर भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। भारत स्पष्ट कर चुका है कि यह क्षेत्र उसका अभिन्न हिस्सा है, जबकि फिलहाल यह अवैध रूप से चीन के कब्जे में है। हाल ही में चीन ने घाटी पर अपना आधिकारिक दावा दोहराया और वहां निर्माण कार्यों को लेकर भारत की आपत्तियों की अनदेखी की।
चीन ने शक्सगाम घाटी में बुनियादी ढांचे के निर्माण का बचाव करते हुए कहा कि यह क्षेत्र ‘चीन का है’ और यहां किसी भी निर्माण में कोई समस्या नहीं है। चीन अपने दावे के समर्थन में 1960 के दशक में पाकिस्तान के साथ हुए सीमा समझौते का हवाला दे रहा है। जबकि भारत ने इस समझौते को कभी स्वीकार नहीं किया और बार-बार यह कहा कि पाकिस्तान कश्मीर का कोई भी हिस्सा दूसरों को हस्तांतरित नहीं कर सकता।
शक्सगाम घाटी की रणनीतिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह काराकोरम दर्रे और सियाचिन ग्लेशियर के बेहद पास स्थित है। अगर चीन यहां सड़क या अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण करता है तो उसकी सैन्य और लॉजिस्टिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार चीन ने घाटी में लगभग 75 किलोमीटर लंबी और 10 मीटर चौड़ी सड़क का निर्माण कर लिया है। यह सड़क सियाचिन ग्लेशियर से महज 50 किलोमीटर दूर है। भारत की चिंता इसलिए जायज है क्योंकि गलवान घाटी में पहले हुए हिंसक संघर्ष को देखते हुए यहां किसी नए संघर्ष की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
पाकिस्तान का इस विवाद में रोल भी महत्वपूर्ण है। 1963 में पाकिस्तान ने चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते के तहत शक्सगाम घाटी को चीन के हवाले कर दिया था। भारत बार-बार इस समझौते को गैरकानूनी मानता रहा है और इसे कश्मीर विवाद सुलझने तक किसी फाइनल सेटलमेंट के रूप में स्वीकार नहीं करता।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि चीन शक्सगाम घाटी में अपने दावे पर अड़ा रहा और वहां अवसंरचना का विस्तार करता रहा, तो भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ सकता है और यह क्षेत्र सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील बन जाएगा।