Monday, January 12

सऊदी अरब या UAE—किसके साथ खड़ा होगा पाकिस्तान? अरब दुनिया की वर्चस्व की जंग में फंसी इस्लामाबाद की कूटनीति

इस्लामाबाद।
अरब दुनिया के दो सबसे प्रभावशाली देशों—सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE)—के बीच बढ़ते तनाव ने पाकिस्तान को कूटनीतिक असमंजस में डाल दिया है। दोनों देशों से दशकों पुराने सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों के चलते पाकिस्तान के सामने अब “किसके साथ और किसके खिलाफ” का सबसे कठिन सवाल खड़ा हो गया है। यह स्थिति पाकिस्तान के लिए वफादारी की परीक्षा बन चुकी है।

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से टेलीफोन पर बातचीत कर सऊदी अरब के साथ एकजुटता जताई, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इस्लामाबाद खुले तौर पर किसी एक पक्ष का समर्थन करने से बच रहा है। खासतौर पर यमन में जारी संघर्ष के मुद्दे पर सऊदी अरब चाहता है कि पाकिस्तान खुलकर उसके साथ खड़ा हो, लेकिन पाकिस्तान की चुप्पी लगातार सवाल खड़े कर रही है।

रक्षा समझौते के बावजूद झिझक

पिछले वर्ष पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच द्विपक्षीय रक्षा समझौता हुआ था। इसके बावजूद पाकिस्तान, सऊदी-UAE विवाद में सऊदी नेतृत्व को खुला समर्थन देने से हिचक रहा है। यमन संघर्ष के दौरान पाकिस्तान ने केवल एक बार अप्रत्यक्ष रूप से सऊदी अरब का समर्थन किया, लेकिन सेना और शहबाज सरकार ने UAE के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इससे रियाद की नाराज़गी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

UAE से भी दूरी मोल लेना मुश्किल

दूसरी ओर, UAE को नाराज़ करना भी पाकिस्तान के लिए भारी पड़ सकता है। हाल ही में जब UAE के राष्ट्रपति पाकिस्तान के अर्ध-आधिकारिक दौरे पर थे, उसी समय यमन में सऊदी अरब ने UAE से जुड़ी सैन्य परिसंपत्तियों पर हमला किया। इस दौरे के दौरान UAE ने पाकिस्तान के सैन्य नियंत्रित फौजी फाउंडेशन में लगभग एक अरब डॉलर के निवेश और दो अरब डॉलर के कर्ज को रोलओवर करने की घोषणा की—जो पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा मानी जा रही है।

तुर्की से गठबंधन और सूडान डील ने बढ़ाई उलझन

पाकिस्तान की रणनीति को और जटिल बनाता है उसका तुर्की के साथ बढ़ता सैन्य सहयोग। इस्लामाबाद चाहता है कि तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के त्रिपक्षीय रक्षा ढांचे का हिस्सा बने। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान सूडान की सेना को लगभग 1.5 अरब डॉलर के हथियार बेचने की तैयारी में है, जिनका इस्तेमाल UAE समर्थित रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) के खिलाफ होने की संभावना है—जो अबू धाबी को नाराज़ कर सकता है।

सऊदी दबाव और JF-17 डील

सूत्रों के मुताबिक, सऊदी अरब पाकिस्तान के नरम रुख पर करीबी नजर बनाए हुए है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच लगभग दो अरब डॉलर के सऊदी लोन को JF-17 फाइटर जेट डील में बदलने को लेकर बातचीत चल रही है। दोनों देशों की वायु सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बैठकें भी हो चुकी हैं।

दूध और मछली एक साथ खाने जैसी स्थिति

हालात उस समय और बिगड़ गए जब सऊदी अरब ने यमन जा रहे UAE के हथियारों के एक शिपमेंट पर हमला कर दिया और अबू धाबी पर “बेहद खतरनाक कदम” उठाने का आरोप लगाया। इससे अरब दुनिया में सैन्य तनाव और गहरा गया है।

आज पाकिस्तान ऐसी स्थिति में खड़ा है, जहां वह न तो सऊदी अरब को नाराज़ कर सकता है और न ही UAE से दूरी बना सकता है। अरब राजनीति की इस रस्साकशी में पाकिस्तान के लिए यह स्थिति सचमुच दूध और मछली को एक साथ खाने” जैसी बन चुकी है—जहां एक गलत कदम उसके रणनीतिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।

 

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