
चेन्नई।
थलपति विजय की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘जन नायकन’ को सेंसर सर्टिफिकेट न मिलने से उपजे विवाद ने अब पूरे तमिल फिल्म उद्योग को आंदोलित कर दिया है। फिल्म की रिलीज टलने और लाखों टिकटों के रिफंड के बीच, सुपरस्टार कमल हासन खुलकर सामने आ गए हैं। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए, लेकिन बेहद सशक्त शब्दों में सेंसर बोर्ड की प्रक्रिया पर सवाल उठाए और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए पूरी इंडस्ट्री से एकजुट होने की अपील की।
कमल हासन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी की गारंटी देता है और यह सिर्फ किसी एक फिल्म या कलाकार का मामला नहीं है, बल्कि पूरे रचनात्मक तंत्र से जुड़ा सवाल है। उन्होंने कहा कि सिनेमा किसी एक व्यक्ति की मेहनत नहीं, बल्कि लेखकों, तकनीशियनों, कलाकारों, प्रदर्शकों और छोटे व्यवसायों की सामूहिक कोशिश है, जिनकी आजीविका समयबद्ध और निष्पक्ष प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि सेंसर प्रक्रिया में स्पष्टता की कमी रचनात्मकता, आर्थिक गतिविधियों और जनता के भरोसे को नुकसान पहुंचाती है। कमल हासन ने मांग की कि सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया पारदर्शी हो, समयसीमा तय हो, और यदि किसी तरह के कट या बदलाव की मांग की जाती है तो उसके ठोस कारण लिखित रूप में दिए जाएं।
कमल हासन ने इसे ऐसा क्षण बताया, जब पूरी फिल्म इंडस्ट्री को एक स्वर में खड़ा होना चाहिए और सरकारी संस्थानों के साथ संवाद कर रचनात्मक स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे सुधार न सिर्फ संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करेंगे, बल्कि कलाकारों और जनता के बीच विश्वास भी बहाल करेंगे।
उधर, अभिनेता रवि मोहन भी थलपति विजय के समर्थन में खुलकर सामने आए। उन्होंने भावुक संदेश में लिखा कि वह एक भाई के रूप में विजय के साथ खड़े हैं और लाखों प्रशंसक उनके साथ हैं। रवि मोहन ने कहा कि विजय को किसी तारीख की जरूरत नहीं, वही ओपनिंग हैं और पोंगल तभी शुरू होगा, जब उनकी फिल्म रिलीज होगी।
गौरतलब है कि ‘जन नायकन’ 9 जनवरी को पोंगल के अवसर पर रिलीज होने वाली थी, लेकिन सेंसर बोर्ड से प्रमाणपत्र न मिलने के कारण इसे टालना पड़ा। अब तक 4.5 लाख से अधिक टिकटों का रिफंड किया जा चुका है, जिसकी अनुमानित राशि एक करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जा रही है। मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है।
यह विवाद अब केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय सिनेमा में अभिव्यक्ति की आज़ादी और सेंसर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर एक बड़ी बहस का रूप ले चुका है।