Tuesday, June 16

This slideshow requires JavaScript.

भारत की विदेश नीति 2026: ट्रंप की टैरिफ धमकी, पड़ोसी देशों में तनाव और आने वाली चुनौतियाँ

 

This slideshow requires JavaScript.

 

नई दिल्ली: साल 2026 भारत की विदेश नीति के लिए कई चुनौतीपूर्ण सवाल लेकर आ सकता है। इस साल की शुरुआत में ही डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने की धमकी ने वैश्विक राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस कदम से भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक संतुलन बनाए रखने की कठिन चुनौती का सामना करना होगा।

 

पाकिस्तान और बांग्लादेश में संभावित संघर्ष:

भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति के तहत पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते को संतुलित रखना 2026 में सबसे बड़ी परीक्षा होगी। पाकिस्तान के साथ एक और सैन्य तनाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। वहीं, बांग्लादेश में चुनावी माहौल और पाकिस्तान के साथ बढ़ते आर्थिक और सैन्य संबंध भारत के लिए एक नई चुनौती पेश करेंगे।

 

चीन और अमेरिका के साथ रिश्तों का संतुलन:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकेत दिए हैं कि 2026 में भारत, चीन और रूस के साथ रिश्तों में सामान्यीकरण की दिशा में कदम बढ़ा सकता है, खासकर जब डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और चीनी दबाव बढ़ने वाला है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को किसी एक खेमे में पूरी तरह शामिल होना व्यावहारिक नहीं होगा, और उसे कूटनीतिक मंचों जैसे क्वाड, ब्रिक्स, एससीओ का सहारा लेना होगा।

 

रूस से ऊर्जा आपूर्ति और रक्षा संबंध:

भारत के लिए रूस के साथ ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्ते बेहद अहम हैं, विशेषकर ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा सहयोग के मामले में। रूस से कच्चे तेल की निरंतर आपूर्ति और रक्षा उपकरणों की सप्लाई भारत के लिए निर्णायक साबित हो सकती है, खासकर जब पश्चिमी देशों के साथ तनाव बढ़ने का खतरा हो।

 

भारत की आंतरिक सुरक्षा और पड़ोसी देशों में अस्थिरता:

नेपाल, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों में भारत-चीन प्रतिस्पर्धा साफ नजर आ रही है। म्यांमार और अफगानिस्तान की अस्थिरता भी भारत की सुरक्षा और कनेक्टिविटी योजनाओं को प्रभावित कर सकती है। बांग्लादेश और नेपाल के चुनाव और उनके आंतरिक संघर्षों से भारत की विदेश नीति को काफी असर हो सकता है।

 

भारत के लिए अवसर:

इन चुनौतियों के बावजूद भारत के पास कई अवसर भी हैं। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव, मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) और व्यापक आर्थिक साझेदारियों (CEPA) के जरिए भारत अपनी आर्थिक ताकत को मजबूत कर सकता है। यूरोप, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और लैटिन अमेरिका में भारत की बढ़ती सक्रियता उसे एक मजबूत वैश्विक खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर सकती है।

 

विशेषज्ञों का दृष्टिकोण:

जेएनयू की प्रोफेसर अंशु जोशी ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने हमेशा अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखा है, लेकिन अब पड़ोसी देशों में जारी संघर्षों का असर भारत की नीति पर होगा।” वहीं, पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत ने कहा कि रूस से कच्चे तेल की आपूर्ति भारत के लिए महत्वपूर्ण है, और इसे छोड़ने से एक बड़ी रणनीतिक गलती हो सकती है।

 

निष्कर्ष:

2026 में भारत को हर मंच पर अपने हितों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए कई कठिन फैसले लेने होंगे। यह साल भारत के लिए वैश्विक राजनीति में संतुलन बनाए रखने और अपने आर्थिक और सुरक्षा हितों को सुरक्षित करने का होगा।

 

Leave a Reply