
नई दिल्ली।
निजी क्षेत्र में कार्यरत करोड़ों कर्मचारियों के लिए कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) से जुड़ी एक अहम खबर सामने आई है। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को ईपीएफ योजना के तहत लागू वेतन सीमा (वेज लिमिट) में संशोधन को लेकर चार महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह वेतन सीमा पिछले 11 वर्षों से बिना किसी बदलाव के 15,000 रुपये प्रतिमाह पर अटकी हुई है।
न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और ए. एस. चंदुरकर की पीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर आदेश की प्रति के साथ केंद्र सरकार के समक्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करें, जिस पर सरकार को तय समय सीमा में फैसला लेना होगा।
नीति के कारण बड़ी आबादी योजना से बाहर
याचिका में कहा गया है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) वर्तमान में केवल 15,000 रुपये तक की मासिक आय वाले कर्मचारियों को ही इस योजना में शामिल करता है। जबकि देश के कई राज्यों में न्यूनतम वेतन ही इस सीमा से अधिक हो चुका है। इसके बावजूद वेतन सीमा में कोई संशोधन नहीं किया गया, जिसके चलते बड़ी संख्या में कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा और भविष्य निधि के लाभ से वंचित रह गए हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने दलील दी कि यह नीति मौजूदा आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है और इसका सबसे ज्यादा नुकसान निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को हो रहा है।
असंगत और मनमाने संशोधन का आरोप
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि पिछले 70 वर्षों में ईपीएफ योजना की वेतन सीमा का पुनरीक्षण बेहद असंगत और मनमाने तरीके से किया गया। कई बार 13 से 14 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद संशोधन हुआ, जबकि इस दौरान महंगाई, न्यूनतम वेतन और प्रति व्यक्ति आय जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतकों को नजरअंदाज किया गया।
याचिका के अनुसार, इसी असंगत नीति के कारण आज पहले की तुलना में कम कर्मचारी ईपीएफ योजना के दायरे में आ पा रहे हैं।
सिफारिश के बावजूद फैसला लंबित
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि वर्ष 2022 में ईपीएफओ की उप-समिति ने वेतन सीमा बढ़ाने और अधिक कर्मचारियों को योजना में शामिल करने की सिफारिश की थी। इस प्रस्ताव को केंद्रीय बोर्ड ने भी मंजूरी दे दी थी, लेकिन इसके बावजूद केंद्र सरकार ने अब तक इस पर अंतिम निर्णय नहीं लिया है।
अदालत की टिप्पणी
याचिका में प्रस्तुत आंकड़ों और विश्लेषण के आधार पर कहा गया कि ईपीएफ योजना अपने शुरुआती 30 वर्षों में एक समावेशी सामाजिक सुरक्षा ढांचे के रूप में कार्य करती रही, लेकिन बीते तीन दशकों में यह धीरे-धीरे कर्मचारियों को बाहर रखने का माध्यम बन गई है।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से अब उम्मीद की जा रही है कि केंद्र सरकार ईपीएफ की वेतन सीमा में संशोधन को लेकर शीघ्र और ठोस निर्णय लेगी, जिससे करोड़ों कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिल सके।