Wednesday, January 7

पराली से प्रदूषण नहीं, मुनाफा: छत्तीसगढ़ के किसान ने ‘वेस्ट’ को बनाया ‘व्हाइट गोल्ड’, रोजाना ₹10,000 की कमाई

नई दिल्ली।
देश के कई हिस्सों में धान की कटाई के बाद पराली जलाना आज भी एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या बना हुआ है। इससे न केवल वायु प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी नष्ट होती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले की बसना तहसील के एक प्रगतिशील किसान ने इस समस्या का ऐसा समाधान निकाला है, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ कमाई का सशक्त मॉडल भी बन गया है।

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बसना निवासी राजेंद्र कुमार साहू ने पराली को जलाने के बजाय उससे पैडी स्ट्रॉ मशरूम उगाकर उसे ‘व्हाइट गोल्ड’ में बदल दिया है। तीन विषयों में एमए की डिग्री रखने वाले राजेंद्र आज मशरूम उत्पादन से हर दिन करीब 10,000 रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं।

पढ़ाई के बाद खेती को बनाया करियर

उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद राजेंद्र कुमार साहू ने खेती को ही अपना जीवन पथ चुना। वर्ष 2005 में उन्होंने ऑयस्टर मशरूम की खेती से शुरुआत की। बाद में उन्होंने महसूस किया कि स्थानीय बाजार में पैडी स्ट्रॉ मशरूम, जिसे क्षेत्रीय भाषा में ‘पारा’ कहा जाता है, की मांग और कीमत दोनों ज्यादा हैं। इसके बाद उन्होंने ओडिशा से बीज (स्पॉन) मंगाकर प्रयोग शुरू किए और धीरे-धीरे इस तकनीक में महारत हासिल कर ली।

राजेंद्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने प्रेशर कुकर और स्पिरिट लैंप जैसे साधारण घरेलू उपकरणों की मदद से खुद ही उच्च गुणवत्ता का स्पॉन तैयार करना सीख लिया। इससे उनकी उत्पादन लागत काफी कम हो गई और बाहरी निर्भरता समाप्त हो गई।

प्रकृति के साथ खेती, कम लागत में बड़ा फायदा

मशरूम उत्पादन के लिए महंगे शेड बनाने के बजाय राजेंद्र ने प्रकृति का सहारा लिया। उन्होंने अपने खेत में आम के पेड़ लगाए और उनकी छाया के नीचे वर्टिकल स्टैंड पर मशरूम बेड तैयार किए। पेड़ों की छांव से तापमान खुले क्षेत्र की तुलना में लगभग 10 डिग्री तक कम रहता है और नमी भी प्राकृतिक रूप से बनी रहती है।

इस खास ‘माइक्रो क्लाइमेट’ की वजह से वे मार्च से अक्टूबर तक, यानी भीषण गर्मी के मौसम में भी सफलतापूर्वक मशरूम का उत्पादन कर पाते हैं।

कमाई का मजबूत गणित

फिलहाल राजेंद्र के पास 2,000 मशरूम बेड लगाने की क्षमता है। वे रोजाना लगभग 50 किलो मशरूम का उत्पादन करते हैं। बाजार में पैडी स्ट्रॉ मशरूम की कीमत 270 से 300 रुपये प्रति किलो तक मिल जाती है, जबकि एक बेड तैयार करने की लागत केवल 70 से 80 रुपये आती है। इस तरह उन्हें रोजाना करीब 10,000 रुपये का शुद्ध लाभ होता है। सर्दियों में वे ऑयस्टर मशरूम की खेती कर सालभर आय बनाए रखते हैं।

जीरो वेस्ट मॉडल बना मिसाल

राजेंद्र कुमार साहू की खेती पूरी तरह जीरो वेस्ट मॉडल’ पर आधारित है। मशरूम उत्पादन के बाद बची पराली को वे फेंकते नहीं, बल्कि वेस्ट डीकंपोजर की मदद से जैविक खाद में बदल देते हैं। इस खाद का उपयोग वे अपने खेतों में करते हैं और अन्य किसानों को भी निःशुल्क उपलब्ध कराते हैं।

अब तक वे हजारों किसानों और युवाओं को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दे चुके हैं। उनकी इस नवाचारी और पर्यावरण-संवेदनशील सोच के लिए उन्हें वर्ष 2019 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

राजेंद्र कुमार साहू की कहानी यह साबित करती है कि सही सोच, तकनीक और मेहनत से खेती केवल पर्यावरण की रक्षा कर सकती है, बल्कि सम्मानजनक और स्थायी आजीविका का माध्यम भी बन सकती है।

 

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