
देश में न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती करोड़ों लंबित मामलों का बोझ है। निचली अदालतों, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कुल 5.41 करोड़ मामले पेंडिंग हैं, जो केवल प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि संवैधानिक संकट का रूप ले चुके हैं।
पेंडेंसी का आंकड़ा
सुप्रीम कोर्ट: 91,892 केस
हाई कोर्ट्स: 63.67 लाख केस (19.01 लाख क्रिमिनल, 44.65 लाख सिविल)
निचली अदालतें: 4.76 करोड़ केस
दिल्ली निचली अदालतें: 15.85 लाख केस
जजों की वैकेंसी: सुप्रीम कोर्ट – 1, हाई कोर्ट – 297, निचली अदालतें – 4,855
राज्यों में स्थिति
उत्तर प्रदेश में निचली अदालतों में 1.13 करोड़ केस पेंडिंग हैं। दिल्ली में 15.85 लाख केस लंबित हैं।
न्यायपालिका का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि पेंडेंसी कम करना प्राथमिकता होगी। संसाधनों का बेहतर उपयोग और समयबद्ध ट्रायल सुनिश्चित करना आवश्यक है। लॉ मिनिस्ट्री ने भी केंद्र सरकार के विभागों को निर्देश दिए हैं कि ऐसे मामलों का त्वरित निपटारा किया जाए, जिनमें सरकार पक्षकार है।
विशेषज्ञों की राय
रिटायर डिस्ट्रिक्ट जज कामिनी लॉ का कहना है कि यह केवल आंकड़ों की समस्या नहीं, बल्कि न्याय तक सार्थक पहुंच को प्रभावित करने वाला संवैधानिक संकट बन चुका है। उन्होंने सुझाव दिया कि सुप्रीम कोर्ट में जोनल बैच और स्थायी संविधान पीठ स्थापित की जाए, ताकि न्याय का विकेंद्रीकरण हो और वादकारियों के सामने भौगोलिक और आर्थिक बाधाएँ कम हों।
समाधान की दिशा
जजों की भर्ती और वैकेंसी भरना
इवनिंग कोर्ट का प्रचार
समरी ट्रायल और टाइम-बाउंड ट्रायल
विशेष अनुमति याचिकाओं का उच्च न्यायालय स्तर पर निपटारा
देश में न्यायपालिका की पेंडेंसी को कम करना अब समय की बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। इससे न केवल न्याय की गति बढ़ेगी, बल्कि संवैधानिक न्याय तक पहुंच भी सुनिश्चित होगी।