
ढाका/नई दिल्ली, 1 जनवरी: बांग्लादेश की राजनीति में नए साल की शुरुआत ही अहम मोड़ लेकर आई है। पहली महिला प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के निधन के बाद ढाका में उनका जनाज़ा मंगलवार को लाखों लोगों की भीड़ में संपन्न हुआ, जिसके कारण नए साल की पूर्व संध्या के सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए। खालिदा जिया की मौत ने BNP को राजनीतिक सहानुभूति और जनाधार में फायदा पहुंचाया है, जिससे पार्टी आगामी 12 फरवरी के चुनावों में मजबूत स्थिति में दिख रही है।
नई दिल्ली के सामने बांग्लादेश में अगली सरकार का समर्थन तय करने के लिए सीमित विकल्प हैं। मुख्य विकल्प हैं BNP, NCP और जमात-ए-इस्लामी। जमात-ए-इस्लामी का कट्टर इस्लामी और भारत-विरोधी रुख भारत के लिए इसे सहयोगी बनाना मुश्किल बनाता है। वहीं NCP ने जमात के साथ गठबंधन कर लिया है। ऐसे में भारत के लिए तारिक रहमान और BNP ही सबसे व्यवहार्य विकल्प बनते हैं।
तारिक रहमान के सामने चुनौती
तारिक रहमान पर नए बांग्लादेश का वादा पूरा करने का दबाव है। खालिदा जिया ने सत्ता में रहते हुए जमात के साथ गठबंधन किया था, जिसके कारण उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा। तारिक के लिए भी जमात से पूरी दूरी बनाना कठिन होगा, लेकिन विदेशी मदद और विकास सुनिश्चित करने के लिए उन्हें ऐसी सरकार बनाने का दबाव है जो भेदभाव न करे। BNP का फायदा यह है कि अवामी लीग पर प्रतिबंध के बाद यह बड़े जनाधार वाली अकेली पार्टी है, जिसके पास मजबूत संगठन और कैडर है।
एनसीपी और जमात का गठबंधन
इस चुनाव में बांग्लादेश की 4.6 करोड़ युवा आबादी की भूमिका निर्णायक होगी। कई युवा जुलाई 2024 में शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन में शामिल रहे थे। इस युवा समूह ने नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) का गठन किया है, जिसने कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर लिया है।
भारत विरोधी भावनाओं का उभार
देश में भारत विरोधी भावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। विशेषकर शेख हसीना सत्ता में रहने के कारण और उस्मान हादी की हत्या के बाद एक नया भारत-विरोधी अभियान शुरू हुआ है। इस तरह के माहौल में सवाल यह है कि क्या तारिक रहमान BNP की अगुआई में सत्ता पर काबिज हो पाएंगे या एनसीपी-जमात गठबंधन नए परिदृश्य का चुनावी लाभ उठाएगा।