
पटना: बिहार में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLSP) के नेता उपेन्द्र कुशवाहा और उनके पुत्र दीपक प्रकाश की राजनीतिक स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है। दीपक फिलहाल टेम्पररी मंत्री हैं, क्योंकि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। ऐसे में छह महीने के भीतर विधान परिषद का सदस्य नहीं बने तो उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है — बीपी मंडल के पुराने अनुभव की तरह।
पटना राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि अगर उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी में टूट-फूट होती है, तो क्या उनका एनडीए में कद पहले जैसा रह पाएगा। भाजपा से उनका हालिया पैचअप अब खतरे में पड़ सकता है। पार्टी टूटने की स्थिति में भाजपा कोटेदार मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजे जाने की राह भी मुश्किल हो सकती है।
पुत्र को मंत्री बनाने की चाल उल्टी पड़ सकती है:
उपेन्द्र कुशवाहा ने अपने पुत्र को मंत्री बनाने की रणनीति से पार्टी को बचाने की कोशिश की थी। हालांकि अब पार्टी में विद्रोह की स्थिति बन रही है और उनके मंत्री पुत्र को लेकर यह कदम उन्हें राजनीतिक रूप से जोखिम में डाल सकता है।
बीपी मंडल का उदाहरण:
1967 में बिहार में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में संसोपा के सांसद बीपी मंडल को मंत्री बनाया गया था। वे विधान मंडल के सदस्य नहीं थे। छह महीने की अवधि में यदि उन्हें विधान परिषद में नहीं भेजा जाता, तो उन्हें पद छोड़ना पड़ा। यह मामला दीपक प्रकाश की वर्तमान स्थिति के लिए सावधानी का सबक है।
विशिष्टता से बने मंत्री:
वहीं, 2006 में नीतीश कुमार की सरकार में पीके शाही को उनकी कानूनी विशेषज्ञता के चलते मंत्री बनाया गया था। वे तब भी विधान परिषद के सदस्य नहीं थे। बाद में मार्च 2006 में उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाया गया। यह मामला बताता है कि अगर सरकार किसी विशेषज्ञ या गठबंधन मजबूरी के कारण किसी को मंत्री बनाती है, तो छह महीने में विधान परिषद का सदस्य बनाना जरूरी है।
अब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या उपेन्द्र कुशवाहा की रणनीति दीपक प्रकाश को सुरक्षित मंत्री बनाए रख पाएगी या बीपी मंडल की तरह उन्हें भी पद छोड़ना पड़ेगा।