Thursday, May 14

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बंगाल में SIR ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के बाद मतुआ बेल्ट में भय का माहौल, पीएम मोदी की रैली पर टिकी निगाहें

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के तहत 58 लाख नाम डिलीट किए गए हैं। चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर आपत्तियां दर्ज कराने के लिए 15 जनवरी तक का समय दिया है। राज्य की मतुआ बेल्ट में SIR प्रक्रिया के बाद भय और बेचैनी का माहौल है। यहाँ के लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली का इंतजार कर रहे हैं, उम्मीद है कि इस कार्यक्रम में वे मतुआ समुदाय के मुद्दों पर बोल सकते हैं।

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मतुआ बेल्ट में चिंता और असुरक्षा

मतुआ समुदाय के लोग वोटर वेरिफिकेशन प्रक्रिया और SIR सुनवाई को लेकर चिंतित हैं। बनगांव के मतुआ समुदाय के एक व्यक्ति ने कहा, “हम सुनवाई और वोटिंग अधिकारों को लेकर परेशान हैं। हमें नहीं पता कि भविष्य में क्या होगा।” राजनीतिक विश्लेषक शुभमय मैत्रा के अनुसार मतुआ गढ़ में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों की SIR प्रक्रिया और नागरिकता से जुड़े मुद्दों को लेकर बहुत आशंका है।

सुनवाई के लिए बुलाए गए अनमैप्ड वोटर

चुनाव आयोग जल्द ही सुनवाई नोटिस भेजना शुरू करेगा। ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के अनुसार कुल 31,39,815 मतदाता बिना मैप किए गए हैं, जिन्हें सुनवाई के लिए बुलाया जाएगा। नादिया जिले में कल्याणी निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 33,185, रानाघाट उत्तर पुरबा (SC) में 31,891 और कृष्णगंज (SC) में 30,024 अनमैप्ड मतदाता हैं। अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रानाघाट उत्तर पश्चिम 28,805, रानाघाट दक्षिण (SC) 27,595 और चकदाह निर्वाचन क्षेत्र में 22,933 अनमैप्ड वोटर हैं।

राजनीतिक परिदृश्य और मतुआ प्रभाव

ऑल इंडिया मतुआ महासंघ के सूत्रों के अनुसार, इन मतुआ-बहुल विधानसभा क्षेत्रों में अनमैप्ड वोटरों की सुनवाई केंद्रीय मुद्दा बन सकती है। 2021 के विधानसभा चुनावों में नादिया जिले की ज़्यादातर सीटें बीजेपी ने जीती थीं। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी बीजेपी को मतुआ बहुल इलाकों से समर्थन मिला।

महतोष बैद्य, पूर्व महासचिव ऑल इंडिया मतुआ महासंघ ने कहा कि मतुआ लोग जल्द से जल्द नागरिकता प्रमाण पत्र की मांग कर रहे हैं, जिससे उनके भय और असुरक्षा का अंत हो सके। कुछ गरीब मतुआ लोग सुनवाई में जाने से डरते हैं और उन्हें आशंका है कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है या बांग्लादेश भेज दिया जाएगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न का मुद्दा मतुआ लोगों के लिए प्रतीकात्मक महत्व रखता है, और यह बीजेपी के हिंदुत्व नैरेटिव के केंद्र में है।

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