Thursday, June 18

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 ‘भारत मॉडल’ की राह पर अमेरिका? डोनाल्ड ट्रंप का ‘वॉरियर डिविडेंड’ और मिड टर्म चुनाव की सियासत

नई दिल्ली: भारत में चुनावी राजनीति का एक जाना-पहचाना हथकंडा रहा है—मुफ्त सुविधाएं, नकद सहायता और कल्याणकारी योजनाओं की बौछार। अब लगता है कि यही चुनावी फॉर्मूला अमेरिका की राजनीति में भी दस्तक दे चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिड टर्म चुनाव से ठीक पहले बड़ा ऐलान करते हुए देश के लाखों सैनिकों को नकद बोनस देने का फैसला किया है, जिसे राजनीतिक गलियारों में ‘भारत मॉडल’ से जोड़कर देखा जा रहा है।

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डोनाल्ड ट्रंप ने क्रिसमस से पहले अमेरिका के करीब 14.5 लाख (1.45 मिलियन) सैनिकों को 1,776 डॉलर (लगभग 1.6 लाख रुपये) देने की घोषणा की है। इस योजना को उन्होंने वॉरियर डिविडेंड’ नाम दिया है। ट्रंप के मुताबिक, यह राशि हाल में लगाए गए टैरिफ से हुई कमाई से दी जाएगी और इसका उद्देश्य सैन्य परिवारों पर बढ़ते आर्थिक दबाव को कम करना है।

व्हाइट हाउस से ऐलान, छुट्टियों से पहले मिलेगा पैसा

यह घोषणा व्हाइट हाउस से की गई, जहां राष्ट्रपति ट्रंप दो क्रिसमस ट्री और अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन की तस्वीर के बीच खड़े नजर आए। उन्होंने कहा कि यह भुगतान छुट्टियों से पहले सैनिकों के खातों में पहुंच जाएगा, ताकि वे अपने परिवार के साथ त्योहार बेहतर ढंग से मना सकें।

मिड टर्म चुनाव से जुड़ा फैसला?

ट्रंप का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब मार्च 2026 में अमेरिका में मिड टर्म चुनाव होने हैं। हाल के महीनों में ट्रंप की लोकप्रियता में आई गिरावट और विपक्ष के बढ़ते हमलों के बीच इस घोषणा को चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सैनिकों और उनके परिवारों के बीच समर्थन मजबूत करने की कोशिश है, ताकि चुनाव में संभावित झटके से बचा जा सके।

क्या होते हैं मिड टर्म चुनाव

अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है, लेकिन कांग्रेस के चुनाव हर दो साल में होते हैं। इन्हीं को मिड टर्म चुनाव कहा जाता है। अमेरिकी कांग्रेस दो सदनों—प्रतिनिधि सभा और सीनेट—से मिलकर बनती है। प्रतिनिधि सभा यह तय करती है कि किन कानूनों पर मतदान होगा, जबकि सीनेट को उन्हें मंजूरी देने या रोकने का अधिकार होता है। कई मामलों में सीनेट राष्ट्रपति की नियुक्तियों की जांच भी कर सकती है। ऐसे में मिड टर्म चुनाव राष्ट्रपति की नीतियों के लिए बेहद अहम माने जाते हैं।

अमेरिका में ‘फ्रीबी पॉलिटिक्स’ नई नहीं

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में ऐसे पहले नेता नहीं हैं, जिन्होंने मुफ्त सुविधाओं या आर्थिक राहत का वादा किया हो। न्यूयॉर्क के मेयर चुनाव में जोहरान ममदानी ने भी बड़े स्तर पर ‘फ्रीबी’ वादे किए थे और ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उनके चुनावी वादों में किराया फ्रीज करना, सिटी बसों को मुफ्त करना, बच्चों के लिए फ्री चाइल्डकेयर और न्यूनतम मजदूरी बढ़ाना शामिल था।

महंगा हेल्थकेयर अमेरिका की बड़ी चुनौती

हालांकि अमेरिका में औसत आय दुनिया के कई देशों से ज्यादा है, लेकिन खर्च भी उसी अनुपात में भारी है। खासकर हेल्थकेयर सिस्टम अमेरिका की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। यहां स्वास्थ्य सेवाएं दुनिया के अन्य विकसित देशों की तुलना में लगभग दोगुनी महंगी हैं। ऊंची दवाइयों की कीमतें और मुनाफा-केंद्रित व्यवस्था के कारण ज्यादातर अमेरिकियों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस अनिवार्य हो गया है। बिना बीमा के मेडिकल बिल चुकाना आम नागरिक के लिए लगभग असंभव माना जाता है।

सवाल यही है…

ट्रंप का ‘वॉरियर डिविडेंड’ वास्तव में सैनिकों के सम्मान और राहत का कदम है या फिर मिड टर्म चुनाव से पहले वोट बैंक मजबूत करने की रणनीति—यह आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन इतना तय है कि ‘फ्रीबी पॉलिटिक्स’ अब सिर्फ भारतीय राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक ताकत अमेरिका में भी इसका असर साफ नजर आने लगा है।

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