Monday, June 22

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रुपये की गिरावट: निर्यातकों के लिए लाभ या नुकसान? रिपोर्ट से खुला असली खेल

नई दिल्ली: भारतीय रुपये के कमजोर होने को लेकर बहस लंबे समय से जारी है। क्या यह वास्तव में भारत के निर्यातकों के लिए लाभकारी है या नुकसानदेह? सिस्टमैटिक्स रिसर्च की नई रिपोर्ट इस पर प्रकाश डालती है। रिपोर्ट के अनुसार, कमजोर मुद्रा कुछ क्षेत्रों को फायदा तो देती है, लेकिन आयात पर निर्भरता के कारण लाभ सीमित हो जाता है।

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कौन से क्षेत्र लाभ में?

रिपोर्ट बताती है कि खाद्य और कृषि-आधारित निर्यात रुपये के कमजोर होने से सबसे अधिक लाभान्वित होते हैं। इन क्षेत्रों को आयात पर कम निर्भरता होने के कारण मुद्रा की कमजोरी सीधे मुनाफे में बदल जाती है। उदाहरण के लिए, चावल, गेहूं और अन्य कृषि उत्पाद सीधे विदेशों में बेचे जाते हैं, जिससे किसानों को अधिक विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।

कौन से क्षेत्र नुकसान में?

वहीं कपड़ा, चमड़ा, रत्न और आभूषण जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों पर रुपया कमजोर होने का उल्टा असर पड़ता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, मशीनरी और पेट्रोलियम उत्पादों को कुछ फायदा जरूर होता है, लेकिन आयातित इनपुट की बढ़ी हुई लागत और वैश्विक मांग में कमजोरी के कारण लाभ खत्म हो जाता है।

कैसे सीमित होता है फायदा?

रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर मुद्रा के लाभ अक्सर वैश्विक परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं। धीमी वैश्विक वृद्धि, बढ़ता संरक्षणवाद और आयात की लागत में वृद्धि, ये सभी प्रभाव रुपये के कमजोर होने के संभावित लाभ को कम कर देते हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई मशीनरी बनाने वाली कंपनी अपने पुर्जे विदेश से आयात करती है, तो रुपया कमजोर होने पर इन पुर्जों की कीमत बढ़ जाती है। भले ही उत्पाद थोड़े सस्ते बेच सकें, लेकिन बढ़ी लागत से मुनाफा कम हो जाता है।

निष्कर्ष:

रुपये की गिरावट निर्यातकों के लिए दोधारी तलवार साबित होती है। जहां खाद्य और कृषि क्षेत्र इसका लाभ उठा सकते हैं, वहीं आयात पर निर्भर और श्रम-गहन क्षेत्र नुकसान में रहते हैं। रिपोर्ट का तर्क है कि कमजोर मुद्रा केवल एक विश्वसनीय नीति उपकरण नहीं है और इसका प्रभाव क्षेत्र और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

रुपया का हाल:

मंगलवार को रुपये की कीमत अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 91.01 पर बंद हुई, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। पिछले 10 कारोबारी सत्रों में रुपया 90 के स्तर से गिरकर 91 तक आ गया है।

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