Friday, July 10

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गुरु-शिष्य मिलन देख भाव-विभोर हुए श्रद्धालु, छलक उठे दोनों के नेत्रशिष्य बोले— “मैं गुरु से मिलने नहीं, गुरु में मिलने आया हूँ”

सोनकच्छ/पुष्पगिरी।
मानव कल्याण स्थली पुष्पगिरी तीर्थ के प्रणेता गणाचार्य आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महामुनिराज के सुयोग्य शिष्य, सिंहनिष्क्रिय व्रतधारी ‘अंतर्मना’ आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज का उपाध्याय मुनि श्री 108 पीयूष सागर जी महाराज एवं संघ सहित पुष्पगिरी तीर्थ पर महामंगल प्रवेश हुआ। इस अवसर पर गुरु-शिष्य का भावपूर्ण मिलन श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत भाव-विभोर कर देने वाला रहा।

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महामंगल प्रवेश से पूर्व अंतर्मना गुरुदेव का मंगल विहार सोनकच्छ स्थित भागीरथ एवेन्यू कॉलोनी से आकाश जैन गुरुभक्त परिवार के सान्निध्य में बैंड-बाजों के साथ पुष्पगिरी तीर्थ के लिए प्रारंभ हुआ। मार्ग में विभिन्न सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक संगठनों द्वारा गुरुदेव का भव्य स्वागत कर आशीर्वाद प्राप्त किया गया।

दोपहर लगभग 3:45 बजे आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महामुनिराज एवं उनके शिष्य अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज का भावपूर्ण मिलन हुआ। शिष्य ने संघ सहित तीन परिक्रमा लगाकर गुरु के चरणों में वंदन किया और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके पश्चात गुरु एवं शिष्य ने एक-दूसरे को आत्मीय भाव से आलिंगन किया। इस दौरान अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी की आंखें नम हो गईं। गुरु-शिष्य के इस अलौकिक मिलन को देखकर उपस्थित श्रद्धालु भी भाव-विभोर हो उठे और पूरा पुष्पगिरी तीर्थ गुरु-शिष्य के जयघोष से गूंज उठा।

पुष्पगिरी परिसर में विद्यालय एवं महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने पुष्पवर्षा कर गुरुदेव का स्वागत किया। गुरु एवं शिष्य एक-दूसरे का हाथ थामकर मंच तक पहुंचे, जहां अंतर्मना गुरुदेव सहित संघ ने आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी के चरणों का प्रक्षालन कर गुरुरज मस्तक पर धारण की। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।

इस अवसर पर अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने अपने संबोधन में कहा, “यदि भरोसा करना है तो केवल गुरु पर करें। परमात्मा का साक्षात्कार भी गुरु के माध्यम से ही संभव है। जीवन में देव, शास्त्र और गुरु के अतिरिक्त सब कुछ अशरण है। जब तक मैं सामान्य था, कोई पूछता नहीं था, लेकिन गुरु ने अपनाकर मुझे अनमोल बना दिया।”

गणाचार्य आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महामुनिराज ने कहा, “परमात्मा हमारे भीतर ही विराजमान हैं। परमात्मा हमसे कुछ लेते नहीं, केवल देते हैं। शिष्य से मिलने से पहले मेरी आंखों से भी आंसू बह रहे थे। बीज भले ही छोटा हो, लेकिन प्रेम रूपी खाद और जल मिलने पर वही विशाल वटवृक्ष बन जाता है। प्रसन्न सागर वही बीज हैं, जो आज वटवृक्ष के रूप में विकसित हो चुके हैं।”

कार्यक्रम में विधायक डॉ. राजेश सोनकर, पुष्पगिरी तीर्थ समन्वयक सुभाष जैन, आकाश जैन, जैन समाज अध्यक्ष महेंद्र पाटोदी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन उपाध्याय मुनि श्री 108 पीयूष सागर जी महाराज ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन पुष्पगिरी तीर्थ अध्यक्ष प्रकाश अजमेरा ने व्यक्त किया।

इस संबंध में जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक रोमिल पाटनी (सोनकच्छ), नरेंद्र अजमेरा (औरंगाबाद), पीयूष कासलीवाल तथा राजकुमार जैन अजमेरा (कोडरमा) ने प्रदान की।

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