Tuesday, February 24

‘हेक्सागन एलायंस’ प्रस्ताव और संभावित रक्षा डील से बढ़ी रणनीतिक हलचल

नई दिल्ली, 24 फरवरी 2026। प्रधानमंत्री Narendra Modi 25 फरवरी से इजरायल के दौरे पर जा रहे हैं। उनकी इस यात्रा से पहले इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने एक ‘छह पक्षीय गठबंधन’ (Hexagon of Alliances) का प्रस्ताव देकर पश्चिम एशिया की कूटनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। माना जा रहा है कि इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच बड़ी रक्षा डील पर मुहर लग सकती है, जिसे रणनीतिक विशेषज्ञ पाकिस्तान के लिए बड़ा संदेश मान रहे हैं।

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क्या है ‘हेक्सागन एलायंस’?

नेतन्याहू के अनुसार, यह पश्चिम एशिया और उसके आसपास के देशों का एक छह-पक्षीय गठबंधन होगा, जिसमें भारत, ग्रीस, साइप्रस और कुछ अरब-अफ्रीकी देश शामिल हो सकते हैं। इसका उद्देश्य आर्थिक सहयोग, राजनयिक सामंजस्य और सुरक्षा तालमेल को मजबूत करना है।

विश्लेषकों का मानना है कि यह परिकल्पना India-Middle East-Europe Economic Corridor (IMEC) की तर्ज पर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और रणनीतिक संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक कदम हो सकती है। नेतन्याहू इसे ईरान और उसके प्रॉक्सी नेटवर्क के प्रभाव के प्रतिसंतुलन के रूप में देखते हैं।

भारत का रुख क्या होगा?

रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) जे.एस. सोढ़ी के मुताबिक, भारत और इजरायल के बीच रक्षा सहयोग पहले से मजबूत है। दोनों देश आतंकवाद और कट्टरपंथ से प्रभावित रहे हैं। हालांकि, भारत की धर्मनिरपेक्ष विदेश नीति को देखते हुए वह किसी ऐसे गठबंधन से दूरी बनाए रख सकता है, जो शिया या सुन्नी ध्रुवों के खिलाफ स्पष्ट रूप से खड़ा हो।

भारत आमतौर पर रणनीतिक स्वायत्तता और संतुलित कूटनीति की नीति पर चलता रहा है।

संभावित रक्षा समझौते पर नजर

विशेषज्ञों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे के दौरान उन्नत रक्षा प्रणालियों पर संयुक्त विकास और तकनीकी साझेदारी की घोषणा संभव है। चर्चाओं में बैलिस्टिक मिसाइल शील्ड, लेजर हथियार, ड्रोन तकनीक और लंबी दूरी की स्टैंड-ऑफ मिसाइलों के संयुक्त निर्माण जैसे विषय शामिल बताए जा रहे हैं।

इजरायल की अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों—Iron Dome, David’s Sling और Arrow—पर सहयोग बढ़ाने की संभावना भी जताई जा रही है।

यदि ऐसी डील होती है, तो यह दक्षिण एशिया के सामरिक संतुलन पर असर डाल सकती है।

हमास की प्रतिक्रिया

इस प्रस्ताव पर हमास के प्रवक्ता हाजेम कासिम ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह योजना क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है और कुछ देशों के हितों को प्राथमिकता देती है।

गौरतलब है कि यह दौरा गाजा संघर्ष के बाद हुए संघर्षविराम के कुछ महीनों बाद हो रहा है, जिससे इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ गई है।

निजी समीकरण भी चर्चा में

प्रधानमंत्री मोदी और नेतन्याहू के व्यक्तिगत संबंधों पर भी इस यात्रा में ध्यान रहेगा। दोनों नेता एक-दूसरे को सार्वजनिक रूप से “मित्र” कह चुके हैं। 2017 के बाद यह मोदी का दूसरा इजरायल दौरा होगा।

दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री के इजरायली संसद (नेसेट) को संबोधित करने की संभावना है, जो एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत माना जाएगा। साथ ही, प्रौद्योगिकी, कृषि, जल प्रबंधन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और व्यापार जैसे क्षेत्रों में नए समझौतों की भी उम्मीद है।

क्या होगा पाकिस्तान पर असर?

विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत–इजरायल रक्षा सहयोग और गहराता है, तो यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में भारत की स्थिति को और मजबूत करेगा। इसे पाकिस्तान के लिए रणनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।

फिलहाल, निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत–इजरायल संबंधों को किस नए स्तर तक ले जाती है—और क्या ‘हेक्सागन एलायंस’ केवल विचार रहेगा या ठोस रूप लेगा।

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