
नई दिल्ली, 23 फरवरी: चुनाव से ठीक पहले राज्य सरकारों द्वारा ‘फ्रीबीज’ यानी मुफ्त सुविधाओं और नगद लाभ की घोषणाओं पर Supreme Court of India ने कड़ी मौखिक टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि यह प्रवृत्ति आखिर कब तक जारी रहेगी और चुनाव आते ही योजनाओं की घोषणाएं क्यों तेज हो जाती हैं?
‘फ्रीबीज’ पर रोक की मांग को लेकर वर्ष 2022 में दायर याचिका पर अभी अंतिम सुनवाई नहीं हो सकी है। हाल में इस मामले को दोबारा सूचीबद्ध करने का आग्रह किया गया, जिस पर अदालत ने संकेत दिया कि मार्च में विस्तृत सुनवाई की जाएगी।
अदालत की हालिया टिप्पणियां
19 फरवरी 2026 को चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि यदि किसी राज्य का राजस्व अधिशेष (सरप्लस) है, तो क्या उसका दायित्व यह नहीं है कि वह धनराशि सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों के विकास पर खर्च करे? अदालत ने सभी राजनीतिक दलों और नेताओं से इस प्रवृत्ति पर पुनर्विचार करने की अपील की।
इससे पहले 12 फरवरी 2025 को भी सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि लगातार मुफ्त राशन और नकद सहायता की योजनाएं लोगों के काम करने की इच्छा को प्रभावित कर सकती हैं।
3 अगस्त 2022 को अदालत ने सुझाव दिया था कि इस जटिल विषय पर विचार के लिए एक विशेषज्ञ समिति (एक्सपर्ट बॉडी) गठित की जा सकती है। 11 अगस्त 2022 को तत्कालीन चीफ जस्टिस ने कहा था कि यह गंभीर मुद्दा है और करदाताओं को भी यह अधिकार है कि वे इस पर सवाल उठाएं।
क्या है याचिका में मांग?
2022 में दायर याचिका में याचिकाकर्ता Ashwini Upadhyay ने चुनावी ‘फ्रीबीज’ को भ्रष्ट आचरण (करप्ट प्रैक्टिस) की श्रेणी में लाने की मांग की थी। 25 जनवरी 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब तलब किया था।
हाल ही में चीफ जस्टिस Suryakant की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष मामले को शीघ्र सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आग्रह किया गया।
याचिकाकर्ता ने 2013 के S. Subramaniam Balaji v. State of Tamil Nadu फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता भी जताई। उस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वादे अपने आप में ‘भ्रष्ट आचरण’ नहीं माने जा सकते।
एक अन्य याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में Prashant Kishor की जन सुराज पार्टी की उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को दोबारा कराने की मांग की गई थी। अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि यदि जनता ने किसी दल को पर्याप्त समर्थन नहीं दिया, तो न्यायिक मंच का उपयोग लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
जटिल होता जा रहा है ‘फ्रीबीज’ का सवाल
17 अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मुफ्त शिक्षा और मुफ्त पानी जैसी योजनाएं क्या ‘फ्रीबीज’ की श्रेणी में आएंगी, यह स्पष्ट करना आसान नहीं है। अदालत के अनुसार, यह बहस केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक और आर्थिक भी है।
आगे की राह
मार्च में प्रस्तावित सुनवाई में यह तय हो सकता है कि क्या चुनावी घोषणा पत्रों में मुफ्त सुविधाओं के वादों को सीमित करने के लिए कोई कानूनी या संवैधानिक ढांचा विकसित किया जाए। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने चुनावी राजनीति में ‘फ्रीबीज’ की संस्कृति पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
