
प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने करदाताओं के पैसे से किसी खास वर्ग के लिए सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा अब एक स्टेटस सिंबल बन गई है और यह तय करना कि किसे सुरक्षा मिले, संबंधित अधिकारियों का काम है, न कि न्यायालय का।
याचिका का विवरण
याचिकाकर्ता विकास चौधरी और अन्य ने अपनी जान को खतरा बताया और पुलिस सुरक्षा की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके फोन हैक किए गए, ईंट-भट्ठे की बाउंड्री वॉल को नुकसान पहुंचाया गया और एक झूठे ट्रस्ट डीड को लेकर केस दर्ज कराया गया।
कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की पीठ ने कहा:
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यह तय करना कि किसे सुरक्षा मिले, संबंधित अधिकारियों का दायित्व है।
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कोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत किसी के लिए सुरक्षा निर्धारित नहीं कर सकती।
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पुलिस सुरक्षा का उपयोग अब प्रिविलेज और स्टेटस का प्रतीक बन गया है।
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सरकार और करदाताओं के पैसे से किसी विशेष वर्ग को लाभ नहीं पहुंचाया जा सकता।
संविधान और न्याय का जिक्र
कोर्ट ने कहा कि भारत एक लिखित संविधान वाला देश है। संविधान की प्रस्तावना के अनुसार, सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से बराबरी और न्याय मिलना चाहिए। राज्य किसी खास वर्ग के लिए सुरक्षा का विशेषाधिकार नहीं बना सकता।
निष्कर्ष
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा का मसला सक्षम प्राधिकारी द्वारा खतरे का आंकलन करने के बाद ही तय होगा। न्यायालय का काम केवल कानून और संविधान की रक्षा करना है, न कि किसी नागरिक के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा सुनिश्चित करना।
