Saturday, February 14

चिकन नेक पर नया संकट? बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी ने सीमावर्ती 51 सीटें जीती, भारत के लिए खतरे की घंटी

ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश में 12 फरवरी को हुए संसदीय चुनाव में जमात-ए-इस्लामी ने कुल 68 सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया। इनमें से 51 सीटें भारत से लगने वाले सीमावर्ती जिलों में हैं, जो भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बन सकती हैं।

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सीमावर्ती जिलों में जमात की बढ़ती पकड़

जमात ने निलफामारी (4), रंगपुर (6), कुरीग्राम (4), गैबांधा (4), चपैनवाबगंज (3), नागांव (1), राजशाही (2), कुश्तिया (3), चुआडांगा (2), झेनैदा (3), जेसोर (4), खुलना (2), सतखीरा (4), मेहरपुर (2), शेरपुर (1), मैमनसिंग (2), सिलहट (1), नोआखली (1) और चटगांव (2) में जीत हासिल की। इन जिलों में जमात की पकड़ पिछले कई वर्षों से मजबूत होती जा रही थी, लेकिन हाल के चुनाव में यह और स्पष्ट हो गई।

भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की सीमावर्ती राज्य जैसे पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और मेघालय के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। खासकर पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों — सतखीरा, झेनैदाह, जेसोर, चपैनवाबगंज, कुरीग्राम, गैबांधा, कुश्तिया और राजशाही — में जमात का प्रभाव बढ़ा है। इन जिलों के मुस्लिम मतदाता जमात को समर्थन दे रहे हैं, जिनमें कुछ के वंशज बंटवारे के बाद भारत से आए थे।

राजनीतिक विश्लेषण

ढाका के राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में जमात की जीत का एक बड़ा कारण सामाजिक और ऐतिहासिक कनेक्शन है। साथ ही, कट्टरपंथी इस्लामी संगठन इन क्षेत्रों में लंबे समय से राजनीतिक पैठ बना रहे हैं। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम के जिलों में यह राजनीतिक उभार भारत की सीमाओं पर स्थिरता के लिए एक सतर्क संदेश है।

वादे और वास्तविकता

हालांकि जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने भारत के साथ दोस्ताना रिश्तों की बात कही थी, राजनीतिक विश्लेषक इसे घरेलू और क्षेत्रीय राजनीति के तहत सोच-समझकर दिया गया बयान मान रहे हैं। चुनावी नतीजों से यह साफ है कि सीमावर्ती इलाकों में उनकी पकड़ मजबूत हुई है और इसे भारत की सुरक्षा के लिए गंभीरता से देखने की जरूरत है।

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