Thursday, February 12

दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रोबेशन जज की बर्खास्तगी को ठहराया सही, तीन मुख्य कारण रहे निर्णायक

नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने प्रोबेशन पीरियड के दौरान बर्खास्तगी के आदेशों को चुनौती दी थी। जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने कहा कि यह टर्मिनेशन पूरी तरह से साधारण प्रक्रिया के तहत किया गया और न तो यह सजा है और न ही कलंकित करने वाला निर्णय।

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कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

  • कोर्ट ने कहा कि प्रोबेशनरी जजों के मामले में संविधान के आर्टिकल 311(2) और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत सीधे लागू नहीं होते।

  • बर्खास्तगी का फैसला याचिकाकर्ता के परफॉर्मेंस, व्यवहार और सर्विस रिकॉर्ड के पूरे आकलन पर आधारित था।

  • कोर्ट ने विशेष रूप से खराब ACR (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) और फुल कोर्ट में रखी गई शिकायतों को ध्यान में रखा।

मामला क्या था?

  • 9 सितंबर, 2024 को याचिकाकर्ता का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वे एक वादी के साथ कथित अमर्यादित और असभ्य व्यवहार करते दिखे।

  • उस समय याचिकाकर्ता द्वारका कोर्ट में साउथ वेस्ट डिस्ट्रिक्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज के रूप में तैनात थे।

  • इस वीडियो को लेकर 2024 में फुल कोर्ट मीटिंग बुलाई गई और उनकी बर्खास्तगी का फैसला लिया गया।

याचिकाकर्ता का तर्क

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि वायरल वीडियो के कारण उन्हें नौकरी से हटाया गया, जो कि कथित सजा के दायरे में आता है। उनका कहना था कि इस तरह का निष्कासन सजा वाले टर्मिनेशन नियमों के खिलाफ है।

प्रतिवादियों की दलील

प्रतिवादियों ने कोर्ट को बताया कि बर्खास्तगी का फैसला वीडियो वायरल होने का परिणाम नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता के 2023 का ACR और सर्विस रिकॉर्ड पर आधारित था। ACR की जांच अगस्त 2024 में पूरी कर ली गई थी और उसका रिकॉर्ड फुल कोर्ट के सामने रखा गया था।

निष्कर्ष

दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की प्रोबेशन पीरियड में बर्खास्तगी को पूरी तरह वैध माना और कहा कि यह फैसला कानून और सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के अंतर्गत लिया गया।

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