
नई दिल्ली: बिहार के मुंगेर जिले के जमालपुर से निकले शेफ गौतम कुमार की कहानी प्रेरणादायक है। संकरी गलियों और रेल इंजन की सीटी के बीच पले-बढ़े इस युवा ने कभी सोचा नहीं था कि उनके बनाए व्यंजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की थाली तक पहुंचेंगे।
गौतम बचपन में हर रोज अपने गांव से कई किलोमीटर पैदल स्कूल जाते थे। उस समय उन्हें हमेशा कुछ कमी महसूस होती थी, जैसे वे कहीं फिट नहीं बैठते। यही भावना उनके शेफ बनने के निर्णय में भी काम आई। उस दौर में खाना बनाना अक्सर महिलाओं का काम माना जाता था और छोटे शहर का लड़का इस क्षेत्र में करियर बनाने की कोशिश करता देख लोगों को हैरानी होती थी।
‘बिहारी’ पहचान के साथ संघर्ष
बिहार से बाहर प्रोफेशनल किचन में प्रवेश करने पर गौतम को अपनी बोली, खानपान और पृष्ठभूमि के कारण ‘बिहारी’ पहचान के साथ जज किया गया। लंबे समय तक उन्हें यह साबित करना पड़ा कि बिहार का खाना केवल साधारण नहीं, बल्कि पोषण और स्वाद का खजाना है।
फाइव-स्टार होटलों में काम करते हुए उन्होंने कॉन्टिनेंटल और इंटरनेशनल डिश, प्लेटिंग और आधुनिक तकनीकों में महारत हासिल की। शांगरी-ला, द इम्पीरियल, ग्रैंड हयात, रेडिसन और मेफेयर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अनुभव ने उन्हें अनुशासन, नेतृत्व और विश्वसनीयता सिखाई।
जड़ों को अपनाया और शुरू किया नया प्रयोग
समय के साथ गौतम ने अपने भोजन की जड़ों को अपनाना शुरू किया। बाजरा, पारंपरिक अनाज, सात्विक व्यंजन और स्थानीय सब्जियां उनके किचन की पहचान बन गईं। साल 2023 में उन्होंने साल्ट कैटरिंग के डायरेक्टर सम्मीर एस गोगिया के साथ क्यूरेटेड आयुर्वेदिक मेनू तैयार किया। भारी, तैलीय और दिखावटी पार्टी खाने की जगह गौतम ने सात्विक सिद्धांतों, मौसमी सामग्री और पाचन संतुलन पर आधारित व्यंजन पेश किए।
वैश्विक मंच तक पहुंचा खाना
गौतम की सोच जल्द ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनी। 2023 में दिल्ली में G20 समिट में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और G20 प्रतिनिधियों के लिए बाजरा-आधारित मेनू परोसा। साल 2025 में जयपुर में IIFA सिल्वर जुबली और मुंबई-उदयपुर की हाई-प्रोफाइल शादियों में उनके सात्विक और आयुर्वेद-केंद्रित व्यंजन चर्चा का विषय बने।
संस्कृति और परंपरा पर भरोसा
आज गौतम कुमार भारतीय पाक नेतृत्व के नए चेहरे के रूप में उभर चुके हैं। वे ट्रेंड्स का अंधाधुंध पीछा नहीं करते, बल्कि परंपरा और आधुनिकता को जोड़ते हैं। जो लड़का कभी ‘बहुत बिहारी’ होने के कारण अलग महसूस करता था, आज वही अपनी पहचान और संस्कृति पर गर्व करता है। उनकी हर प्लेट में सादगी, पोषण और जड़ों की ताकत झलकती है।
