Thursday, February 12

मतदाताओं को मिले सांसद-विधायकों को हटाने का अधिकार, राज्यसभा में राघव चड्ढा ने उठाई ‘राइट टू रिकॉल’ की मांग

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद के उच्च सदन में लोकतंत्र से जुड़ा एक अहम मुद्दा उठाते हुए कहा कि देश के मतदाताओं को ‘राइट टू रिकॉल’ यानी अपने चुने हुए सांसद या विधायक को वापस बुलाने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता या क्षेत्र की उपेक्षा करता है, तो जनता को उसे पद से हटाने का संवैधानिक अधिकार होना चाहिए।

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राघव चड्ढा ने कहा कि यह व्यवस्था मतदाताओं के लिए एक इंश्योरेंस सिस्टम की तरह होगी, जिससे नेताओं पर जनता के प्रति जवाबदेही बनी रहेगी।

24 देशों में पहले से लागू है यह व्यवस्था

चड्ढा ने बताया कि दुनिया के करीब 24 देशों में ‘राइट टू रिकॉल’ जैसी व्यवस्था मौजूद है। हालांकि, सभी देशों में यह नियम एक समान नहीं है। कहीं यह स्थानीय निकायों तक सीमित है, तो कहीं सांसदों और राष्ट्रपति जैसे शीर्ष पदों पर भी लागू होता है।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत में राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों में पंचायत स्तर पर राइट टू रिकॉल की व्यवस्था पहले से लागू है।

जनता को मिले अधिकार, नेताओं पर बने दबाव

सांसद ने कहा कि अक्सर चुनाव जीतने के बाद कई नेता जनता से दूरी बना लेते हैं और वादों को भूल जाते हैं। ऐसे में यदि मतदाताओं को उन्हें हटाने का अधिकार मिल जाए, तो जनप्रतिनिधियों में काम करने का दबाव और जिम्मेदारी बढ़ेगी।

उन्होंने इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम बताते हुए कहा कि इससे जनता की शक्ति केवल मतदान तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जनप्रतिनिधियों पर लगातार निगरानी बनी रहेगी।

कैसे लागू हो सकता है राइट टू रिकॉल?

राघव चड्ढा ने सुझाव दिया कि यदि किसी क्षेत्र के कुल मतदाताओं में से 50 प्रतिशत लोग राइट टू रिकॉल का समर्थन करें, तो संबंधित सांसद या विधायक को हटाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि जब राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और अन्य संवैधानिक पदों पर हटाने की प्रक्रिया संविधान में मौजूद है, तो फिर आम जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों को हटाने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए।

इन देशों में लागू है राइट टू रिकॉल

राइट टू रिकॉल व्यवस्था जिन देशों में किसी न किसी स्तर पर मौजूद है, उनमें शामिल हैं—
अमेरिका (कुछ राज्यों में), कनाडा, स्विट्जरलैंड, फिलीपींस, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया, अर्जेंटीना, लातविया, स्लोवाकिया, रोमानिया, पोलैंड, सर्बिया, यूक्रेन, वेनेजुएला, बोलीविया, इक्वाडोर, पेरू, कोलंबिया, पनामा, मेक्सिको, रूस, नेपाल और भारत (कुछ राज्यों में स्थानीय निकायों तक)।

सदन में दिखा मतभेद

हालांकि, राघव चड्ढा की इस मांग पर सदन में सभी सदस्य सहमत नहीं दिखे। कई सांसदों ने इसे लेकर असहमति जताई और कहा कि इससे राजनीतिक अस्थिरता भी पैदा हो सकती है। बावजूद इसके, यह मुद्दा संसद में चर्चा का केंद्र बन गया है।

लोकतंत्र में जनता की ताकत बढ़ाने की पहल

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो यह जनप्रतिनिधियों को जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह बना सकती है। वहीं, इसके विरोधियों का कहना है कि इसका दुरुपयोग कर राजनीतिक प्रतिशोध का माध्यम भी बनाया जा सकता है।

फिलहाल राघव चड्ढा की यह मांग देश में लोकतंत्र और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को लेकर एक नई बहस छेड़ चुकी है।

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