
नई दिल्ली। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से संसद में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच टकराव की स्थितियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। लोकसभा और राज्यसभा में अध्यक्ष और सभापति के आसनों की ओर कागज फेंकना, टेबल पर खड़े होकर मिमिक्री करना जैसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं। ये व्यवहार संसदीय परंपरा के विपरीत हैं और देश की राजनीति के लिए चिंता का विषय बने हैं।
सत्ता पक्ष का आरोप है कि कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान व्यवधान डालने की योजना बनाई थी। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री से सदन में न आने का अनुरोध किया था, क्योंकि कुछ अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न होने की आशंका थी। वहीं कांग्रेस का कहना है कि यदि विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने का अवसर नहीं मिला तो प्रधानमंत्री को भी बोलने नहीं दिया जाएगा।
ऐसा पहली बार नहीं है जब संसद में हंगामा हुआ हो। UPA सरकार के दौरान कॉमनवेल्थ और 2G घोटाले के मामलों में भी कार्यवाही बाधित हुई थी। 2014 में आंध्र प्रदेश के विभाजन का विधेयक पारित करने के दौरान भी कई विवाद हुए थे।
राहुल गांधी का अपना स्पष्ट एजेंडा नजर आता है। वे सदन में सरकार की आलोचना के लिए अलग मुद्दों को आधार बना रहे हैं। इस बार उनके निशाने पर पूर्व थल सेना अध्यक्ष मनोज नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक थी, हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि सरकार ने गलवान संघर्ष के बाद चीन के खिलाफ सेना के हाथ बांधे।
सांसद राहुल गांधी देश के संविधान और लोकतंत्र की रक्षा का संदेश देते हुए Zen G के माध्यम से अपील कर चुके हैं। विपक्ष का उद्देश्य स्पष्ट है—सत्ता पक्ष की सुरक्षा और रक्षा को लेकर नीति पर सवाल उठाना और सरकार को कमजोर दिखाना।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान स्थिति ठीक नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ता तनाव संसद और लोकतंत्र दोनों के लिए हानिकारक हो सकता है।
