
नई दिल्ली। रूस वर्तमान में सदी के सबसे गंभीर श्रम संकट का सामना कर रहा है। देश की अर्थव्यवस्था को अगले दशक तक लगभग 1.1 करोड़ अतिरिक्त श्रमिकों की जरूरत है। इसका असर न सिर्फ रूस के उद्योगों पर पड़ रहा है, बल्कि भारत समेत अन्य आबादी वाले देशों के लिए भी नए अवसर पैदा कर रहा है।
जनसांख्यिकीय गिरावट और युद्ध ने बढ़ाई चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार, रूस का यह संकट दो बड़ी वजहों से गंभीर हुआ है:
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जनसांख्यिकीय गिरावट – रूस में लगभग एक चौथाई आबादी रिटायरमेंट की उम्र को पार कर चुकी है। 1990 के दशक से जन्म दर में गिरावट जारी है।
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यूक्रेन युद्ध – युद्ध में भर्ती किए गए नागरिकों और सैन्य उद्योगों में स्थानांतरित श्रमिकों की वजह से नागरिक क्षेत्रों में श्रम की कमी और बढ़ गई है। अनुमान है कि 5 लाख से 8 लाख कामकाजी उम्र के रूसी नागरिक युद्ध और अन्य कारणों से देश छोड़ चुके हैं।
इस कारण, रूस को सेंट्रल एशिया के बाहर भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका और चीन जैसे देशों से श्रमिकों की तलाश करनी पड़ रही है।
भारत को मिली नई अवसर की खिड़की
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा के दौरान अस्थायी श्रम प्रवासन समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके तहत भारतीय श्रमिकों के लिए परमिट की संख्या पिछले साल 5,000 से बढ़कर 56,000 से अधिक हो गई।
इस साल भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों के वर्कर्स ने रूस के प्रमुख शहरों में बर्फ साफ करने, निर्माण स्थलों, रेस्तरां और शहरी सेवाओं में काम करना शुरू कर दिया है।
रूसी कंपनियों को भुगतना पड़ रहा खामियाजा
रूस की बड़ी कंपनियों, जैसे एमएमसी नोरिल्स्क निकल और जेएससी शिपबिल्डिंग कॉर्पोरेशन अक बार्स, को श्रमिकों की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। कुशल श्रमिकों की कमी ने इन कंपनियों को उनकी क्षमता के आधे पर काम करने के लिए मजबूर कर दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी श्रमिक विशेष रूप से भारत और उत्तर कोरिया से आए कर्मचारी, रूस में कम लागत पर समान पदों पर काम कर सकते हैं। इससे रूसी कंपनियों को कामकाजी शक्ति की कमी और उत्पादन लागत के संतुलन में मदद मिल रही है।
प्रशिक्षण और भाषा की चुनौती
रूस में काम करने वाले भारतीय श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण केंद्र और भाषा कोर्स स्थापित किए गए हैं। चेन्नई में वेल्डिंग प्रशिक्षण केंद्र, और कुछ एजेंसियों द्वारा होटल व रेस्तरां स्टाफ के लिए रूसी भाषा क्रैश कोर्स चलाए जा रहे हैं। यह सुनिश्चित करता है कि श्रमिक जल्दी से काम में शामिल हो सकें और दक्षता बनाए रखें।
दीर्घकालिक समस्या और समाधान की जरूरत
स्वतंत्र जनसांख्यिकीविद् इगोर एफ्रेमोव का कहना है कि रूस का श्रम संकट अस्थायी नहीं है। युवा और कार्यक्षम आबादी घटती रहेगी, और यह दशकों तक एक सामान्य स्थिति बनी रहेगी। इसलिए रूस को अपनी अर्थव्यवस्था और श्रम नीति को लंबे समय तक अनुकूलित करना होगा।
निष्कर्ष: भारत के लिए अवसर और जिम्मेदारी
रूस के श्रम संकट ने भारतीय श्रमिकों के लिए नई नौकरी के अवसर पैदा किए हैं। यह दोनों देशों के बीच आर्थिक और मानव संसाधन सहयोग को भी बढ़ावा दे रहा है। हालांकि, यह स्थिति भारत के लिए एक साफ-सुथरी रणनीति और तैयारी की मांग भी करती है, ताकि भारतीय वर्कर्स को उचित सुरक्षा, प्रशिक्षण और मजदूरी मिले।
रूस के लिए भारतीय श्रमिक समाधान बन सकते हैं, और भारत के लिए यह अवसर अंतरराष्ट्रीय रोजगार और राजनयिक संबंधों में मजबूती का कारण बन सकता है।