
नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से जिस ट्रेड डील का इंतजार किया जा रहा था, आखिरकार उसका ऐलान हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सप्ताह की शुरुआत में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा कर दी। माना जा रहा है कि यह डील भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हाल ही में हुई ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ से भी बड़ी साबित हो सकती है।
इस घोषणा का असर भारतीय बाजारों में तुरंत देखने को मिला। लंबे समय से सीमित दायरे में कारोबार कर रहे शेयर बाजारों ने तेजी दिखाई और निवेशकों के बीच सकारात्मक माहौल बन गया। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह डील वाकई भारत की हर समस्या का समाधान बन पाएगी, या फिर कई चुनौतियां अभी भी बनी रहेंगी?
टैरिफ घटने से भारत को सबसे बड़ी राहत
भारत-अमेरिका ट्रेड डील के तहत आपसी टैरिफ को घटाकर 18% कर दिया गया है। इससे भारत की सबसे बड़ी तात्कालिक समस्या यानी अनिश्चितता काफी हद तक खत्म हो जाती है।
बीते कई महीनों से भारत को उन देशों की श्रेणी में रखा जा रहा था जिन पर अमेरिका द्वारा भारी टैरिफ लगाए जा सकते थे। अब टैरिफ घटने के बाद भारत खुद को वियतनाम और थाईलैंड जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के बराबर पाता है। इससे भारतीय निर्यातकों को राहत मिलेगी और बाजारों पर दबाव कम होगा।
रुपये को मिलेगा सहारा, CAD पर नियंत्रण की उम्मीद
विश्लेषकों के मुताबिक इस डील से भारतीय रुपये पर दबाव घट सकता है। अमेरिका को निर्यात बढ़ने की संभावना से भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी।
इसका संकेत मंगलवार को देखने को मिला, जब रुपया एक फीसदी से ज्यादा मजबूत हुआ। यह बताता है कि घरेलू मुद्रा के खिलाफ एकतरफा सट्टेबाजी अब आसान नहीं रह जाएगी।
12-13% रह सकता है प्रभावी टैरिफ
विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक रूप से भारत पर प्रभावी टैरिफ दर 12-13% तक रह सकती है, जो पहले के अनुमानित 30-35% के मुकाबले काफी कम है।
BofA सिक्योरिटीज के अर्थशास्त्री राहुल बजोरिया के अनुसार, इससे खासकर भारत के श्रम-गहन निर्यात क्षेत्रों को बड़ा फायदा होगा। इनमें प्रमुख रूप से—
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रत्न और आभूषण
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कपड़ा उद्योग
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कृषि उत्पाद
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इंजीनियरिंग सामान
फार्मास्यूटिकल्स और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टरों को 50% टैरिफ से छूट मिलने की बात भी सामने आई है।
लेकिन पुरानी स्थिति जैसी राहत अभी नहीं
हालांकि टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया गया है, फिर भी यह अमेरिका की पुरानी नीति की तुलना में ज्यादा ही है।
उदाहरण के तौर पर, 2024 में भारतीय उत्पादों पर औसत अमेरिकी टैरिफ सिर्फ 2.5% के आसपास था। यानी राहत जरूर मिली है, लेकिन इसे पूरी तरह “फ्री ट्रेड” वाली स्थिति नहीं कहा जा सकता।
कौन-सी समस्याएं हल होंगी?
1. निर्यात पर दबाव घटेगा
टैरिफ कम होने से भारत का अमेरिका को निर्यात मजबूत हो सकता है। इससे उद्योगों में उत्पादन बढ़ेगा और रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
2. निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा
ट्रेड डील से अनिश्चितता घटती है, जिससे विदेशी निवेशकों का भरोसा लौटने की संभावना बनती है।
3. भारत को प्रतिस्पर्धी देशों पर बढ़त
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को आसियान देशों के मुकाबले हल्का फायदा मिलेगा, क्योंकि वियतनाम-थाईलैंड जैसे देशों को करीब 19-20% टैरिफ मिला है, जबकि भारत के लिए 18% तय किया गया है।
कौन-सी चुनौतियां अभी भी रहेंगी?
1. पूंजी बाहर जाने की समस्या तुरंत खत्म नहीं होगी
हालांकि डील से बाजार को राहत मिली है, लेकिन विदेशी पूंजी का बाहर जाना (Capital Outflow) और अस्थिर निवेश प्रवाह जैसी समस्याएं मध्यम अवधि में बनी रह सकती हैं।
2. FDI की सुस्ती बनी रह सकती है
भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पहले से ही सुस्त चल रहा है। ट्रेड डील के बावजूद इसमें तुरंत उछाल आना आसान नहीं है।
3. ऊर्जा लागत बढ़ने का खतरा
रूसी तेल आयात पर पूरी तरह रोक का मतलब यह हो सकता है कि भारत को महंगा तेल खरीदना पड़े। इससे ऊर्जा आयात लागत बढ़ सकती है और महंगाई पर भी दबाव आ सकता है।
4. अमेरिका से 500 अरब डॉलर की खरीद का दबाव
भारत ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर के उत्पाद खरीदने पर सहमति जताई है, लेकिन अभी इसकी कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं है। यदि इसे तेजी से लागू किया गया, तो यह भारत के व्यापार संतुलन के लिए चुनौती बन सकता है।
भारत-अमेरिका व्यापार की मौजूदा तस्वीर
वित्त वर्ष 2024-25 में—
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भारत का अमेरिका से आयात: 46 अरब डॉलर
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अमेरिका को भारत का निर्यात: 86.5 अरब डॉलर
वहीं, चालू वित्त वर्ष (अप्रैल-दिसंबर) में अमेरिका को भारत का निर्यात 9.75% बढ़कर 65.87 अरब डॉलर पहुंच चुका है।
निष्कर्ष: डील राहत है, लेकिन संपूर्ण समाधान नहीं
भारत-अमेरिका ट्रेड डील निश्चित रूप से भारत के लिए बड़ी राहत है। इससे निर्यात को मजबूती, रुपये को सहारा और बाजारों में सकारात्मक माहौल बनने की संभावना है।
लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह डील भारत के हर मर्ज की दवा बन जाएगी। विदेशी निवेश की सुस्ती, पूंजी निकासी, ऊर्जा लागत और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियां अभी भी भारत के सामने बनी रहेंगी।
यानी डील ने रास्ता जरूर आसान किया है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने के लिए भारत को अभी कई मोर्चों पर मेहनत जारी रखनी होगी।