
बक्सर: बिहार का बक्सर सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि इतिहास का जीवंत उदाहरण है। हड़प्पा संस्कृति से लेकर ब्रिटिश शासन तक, बक्सर ने अनेक मोड़ और कहानियां देखीं। प्राचीन काल में इसे सिद्धाश्रम, वेदगर्भ पुरी, करुष, तपोवन, चैत्रथ और व्याघ्रसर के नाम से जाना जाता था। कहते हैं कि आज का नाम व्याघ्रसर से ही बक्सर के रूप में विकसित हुआ।
प्राचीन इतिहास और पौराणिक कथाएं
बक्सर की पहचान युद्ध और धार्मिक घटनाओं से भी जुड़ी रही है। पुराणों के अनुसार, यह क्षेत्र देवताओं और राक्षसों के युद्धक्षेत्र के रूप में जाना जाता था। एक प्रसिद्ध कथा में बताया गया है कि ऋषि दुर्वासा के अभिशाप के परिणामस्वरूप, ऋषि वेदशीरा के बाघ का चेहरा पवित्र कुंड में स्नान करने से पूर्वावस्था में लौट आया, जिसे व्याघ्रसर कहा गया।
एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण ने बक्सर में अपनी शिक्षा ग्रहण की। यहां स्थित अस्सी हजार संतों का आश्रम राक्षसों की बलि से परेशान था। भगवान राम ने इसी स्थान पर प्रसिद्ध राक्षसी तड़का का वध किया। अहिरौली गांव, जो बक्सर से लगभग छह किलोमीटर दूर है, वह जगह है जहां गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या ने राम के चरणों के स्पर्श से मुक्ति पाई।
मुगल काल और बक्सर
मुगल काल में बक्सर का महत्व बढ़ गया। यह हुमायूं और शेरशाह के युद्धों के लिए भी जाना जाता है। 1539 में लड़ा गया चोसा युद्ध बक्सर के इतिहास का अहम हिस्सा है।
ब्रिटिश शासन में बक्सर
ब्रिटिश काल में भी बक्सर एक रणनीतिक और सत्ता का केंद्र था। 23 मार्च 1764 को सर हिटर मुनरो की अगुवाई में ब्रिटिश सेना ने कतकौली के मैदान में मीर कासिम, शुजा-उद-दौलह और शाह आलम-द्वितीय की सेना को हराया। इस ऐतिहासिक लड़ाई की याद में अंग्रेजों द्वारा बनाए गए पत्थर के स्मारक आज भी वहां मौजूद हैं।
निष्कर्ष
हड़प्पा काल से लेकर ब्रिटिश शासन तक, बक्सर ने हमेशा धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्षों की साक्षी बनी है। यह शहर न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नक्शे पर अपनी अनूठी पहचान रखता है।