
नई दिल्ली: गाजियाबाद की त्रासदी ने एक बार फिर डिजिटल दुनिया के खतरों को उजागर किया है। बीते दिनों तीन नाबालिग सगी बहनों ने 9वें फ्लोर से कूदकर अपनी जान दे दी, और शुरुआती रिपोर्ट्स में इसका कारण टास्क-आधारित ऑनलाइन गेमिंग की लत बताया जा रहा है।
आज बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक हथियार बन चुके हैं। सोशल मीडिया और टास्क-आधारित गेम्स मासूम दिमागों को हाईजैक कर अवसाद और आत्महत्या जैसी परिस्थितियों की ओर धकेल रहे हैं।
डिजिटल दुनिया का पुराना खतरनाक खेल
यह घटना कोई नई नहीं है। साल 2017 में ब्लू व्हेल चैलेंज ने बच्चों को टास्क पूरे करने के बाद आत्महत्या के लिए उकसाया था। इसके बाद मोमो चैलेंज, पिंक व्हेल, और अब PUBG, Free Fire तथा कोरियन लव गेम्स जैसी गेम्स ने बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ाया है। ये गेम्स सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ब्रेन वॉश करने वाले मानसिक हथियार बन चुके हैं।
बढ़ता स्क्रीन टाइम भारत के लिए खतरे की घंटी
Economic Survey 2025-26 के अनुसार, भारतीय बच्चे सुरक्षित माने जाने वाली सीमा से दोगुना समय स्क्रीन पर बिता रहे हैं। दुनिया में सबसे सस्ते इंटरनेट डेटा का यह नुकसान बच्चों की मानसिक और सामाजिक क्षमता पर गंभीर असर डाल रहा है।
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रील्स और शॉर्ट्स ने बच्चों के अटेंशन स्पैन को पहले ही कम कर दिया है।
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गाजियाबाद की घटना बताती है कि बच्चे अब वर्चुअल कैरेक्टर्स के प्यार में भी पड़ने लगे हैं।
अगर बच्चे ब्लू व्हेल और कोरियन लव गेम्स जैसे खतरनाक गेम्स से दूर रहें, तो आज ही कड़े नियम लागू करना जरूरी है।
दुनियाभर में बच्चों की सुरक्षा को लेकर पाबंदी
यह समस्या केवल भारत की नहीं है।
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ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा देश बना है, जहाँ बच्चों के लिए सोशल मीडिया को पूरी तरह बैन कर दिया गया।
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नॉर्वे और डेनमार्क ने सोशल मीडिया एक्सेस की न्यूनतम उम्र 13 से बढ़ाकर 15 कर दी।
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यूरोप और यूके भी इस दिशा में कदम बढ़ाने की योजना बना रहे हैं।
इन देशों का साफ कहना है कि सोशल मीडिया और टेक कंपनियां बच्चों के दिमाग के साथ खेल रही हैं। ऐसे में यह समय है कि भारत भी बच्चों की सुरक्षा के लिए कड़े नियम लागू करे और टेक कंपनियों से पालन सुनिश्चित कराए।