Thursday, February 5

गाजियाबाद की त्रासदी के बाद बहस: कोरियन कंटेंट या पैरेंटिंग—कहां हुई चूक?

नई दिल्ली/गाजियाबाद: गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की नौवीं मंजिल से गिरकर मौत की घटना ने पूरे दिल्ली-एनसीआर को झकझोर दिया है। हादसे के बाद हाउसिंग सोसायटियों में बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल, डिजिटल कंटेंट और पैरेंटिंग को लेकर तेज बहस छिड़ गई है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ऐसी स्थिति तक बात पहुंची कैसे।

This slideshow requires JavaScript.

स्थानीय निवासियों के मुताबिक तीनों बच्चियां बेहद शांत रहती थीं और सोसायटी के अन्य बच्चों के साथ कम ही घुलती-मिलती थीं। सातवीं मंजिल पर रहने वाले एक पड़ोसी ने बताया कि करीब 15 दिन पहले उनके फ्लैट से कागज के छोटे-छोटे टुकड़े नीचे गिरते देखे गए थे। जब इस बारे में पूछने पर घर से एक महिला बाहर आईं और इसे बच्चों की शरारत बताकर टाल दिया गया। पड़ोसी का कहना है कि उस समय घर का माहौल सामान्य नहीं लगा था।

अलग-थलग रहती थीं बच्चियां

अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि बच्चियां स्कूल नहीं जा रही थीं। ट्यूशन की व्यवस्था की गई थी, लेकिन वहां भी वे अलग-थलग रहती थीं। बताया जाता है कि वे अपने असली नाम के बजाय विदेशी नाम बताती थीं, जिससे लोग हैरान थे। परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आए हैं, जिससे घटना को समझना और जटिल हो गया है।

मोबाइल और स्क्रीन टाइम पर उठे सवाल

घटना के बाद सोसायटी परिसर में माता-पिता के बीच बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कई अभिभावकों ने बच्चों को स्क्रीन टाइम सीमित करने की बात कही, वहीं कुछ बच्चों ने इसका विरोध भी किया। लोगों का कहना है कि पढ़ाई और होमवर्क के नाम पर फोन देना जरूरी हो गया है, लेकिन निगरानी की कमी बच्चों को डिजिटल दुनिया में भटका सकती है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल कंटेंट का असर तब खतरनाक हो जाता है जब बच्चों और अभिभावकों के बीच संवाद कमजोर हो। केवल पाबंदी लगाने के बजाय बातचीत, भरोसा और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि किसी एक कारण को दोष देना आसान है, लेकिन ऐसी घटनाएं अक्सर कई सामाजिक और पारिवारिक कारणों का परिणाम होती हैं।

गाजियाबाद की यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि शहरी समाज के सामने खड़ा एक कठिन सवाल है—क्या हम अपने बच्चों को समझ पा रहे हैं?

Leave a Reply