Thursday, February 5

कोरियन लहर का बढ़ता असर: गाजियाबाद की त्रासदी ने बच्चों की ‘डिजिटल दुनिया’ पर खड़े किए सवाल

गाजियाबाद: गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह सिर्फ एक पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि आज के युवाओं की बदलती डिजिटल दुनिया, सांस्कृतिक प्रभाव और पैरेंटिंग के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली घटना बन गई है। जांच में सामने आए पत्र और परिवार के बयान इस ओर इशारा करते हैं कि बच्चियां विदेशी डिजिटल कंटेंट, खासकर कोरियन पॉप कल्चर से गहराई से प्रभावित थीं।

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क्यों बढ़ रहा है कोरियन कंटेंट का आकर्षण?

आज का युवा वैश्विक डिजिटल संस्कृति के बीच पल रहा है। K-Pop, K-Drama, ऑनलाइन गेम्स और एशियाई वेब कंटेंट सीधे किशोरों को टारगेट करते हैं। 17 वर्षीय छात्र अबीर बताते हैं कि इन ड्रामों में स्कूल-कॉलेज की दोस्ती, सपने और संघर्ष दिखते हैं, जिससे युवा खुद को जुड़ा महसूस करते हैं। वहीं कोरियन भाषा सीख रहीं आयुषी यादव कहती हैं कि इन कंटेंट में दोस्ती, पहचान और आत्मविश्वास का संदेश मिलता है — जो युवाओं को अपनी ओर खींचता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह आकर्षण अचानक नहीं आया। 2000 के दशक में पूर्वोत्तर भारत से शुरू हुई ‘हॉल्यू’ यानी कोरियन लहर ने कोविड लॉकडाउन के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए पूरे देश में जगह बना ली। घरों में बंद युवा वैश्विक कंटेंट से जुड़ते गए और यह एक सांस्कृतिक ट्रेंड बन गया।

खतरा कब बनती है डिजिटल लत?

बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार समस्या कंटेंट नहीं, बल्कि संतुलन की कमी है। जब स्क्रीन ही पूरी दुनिया बन जाए, परिवार और वास्तविक रिश्तों से दूरी बढ़ने लगे, तब खतरे की घंटी बजती है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अचानक फोन छीन लेना या कड़ी पाबंदी लगाना अक्सर बच्चों को और अधिक मानसिक दबाव में डाल देता है। संवाद, भरोसा और भावनात्मक समझ ही असली समाधान है।

गाजियाबाद मामले में सामने आया पत्र बताता है कि बच्चियां खुद को अपनी पसंद की दुनिया से कटता हुआ महसूस कर रही थीं। यह सिर्फ मनोरंजन की पसंद का मामला नहीं, बल्कि पहचान, स्वीकार्यता और भावनात्मक जुड़ाव का सवाल बन चुका था।

समाज के सामने बड़ा सवाल

यह घटना किसी एक संस्कृति या कंटेंट को दोष देने का आसान रास्ता दिखाती है, लेकिन असली चुनौती उससे कहीं बड़ी है — क्या हम अपने बच्चों की भावनात्मक दुनिया को समझ पा रहे हैं? क्या परिवारों में बातचीत की जगह घटती जा रही है? क्या डिजिटल पीढ़ी और अभिभावकों के बीच दूरी बढ़ रही है?

गाजियाबाद की यह त्रासदी चेतावनी है कि बच्चों की दुनिया अब सिर्फ घर और स्कूल तक सीमित नहीं रही। वह वैश्विक है, तेज है और बेहद प्रभावशाली है। जरूरत रोकने की नहीं, समझने और साथ चलने की है।

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