
दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि निजी स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोतरी पर रोक लगाने के उद्देश्य से बनाया गया दिल्ली स्कूल शिक्षा (फीस निर्धारण व विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 शैक्षणिक सत्र 2025-26 में लागू नहीं किया जाएगा। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह कानून अब सत्र 2026-27 से प्रभावी होगा।
मंगलवार को जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने यह जानकारी दी। यह सुनवाई निजी स्कूल संघों द्वारा दायर याचिकाओं पर हो रही थी, जिनमें इस कानून को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसका मुख्य उद्देश्य कानून को जल्दबाजी में लागू किए जाने से रोकना था। चूंकि सरकार ने स्वयं इसे अगले शैक्षणिक सत्र से लागू करने की बात कही है, इसलिए शीर्ष अदालत ने हस्तक्षेप की आवश्यकता समाप्त मानते हुए याचिका खारिज कर दी। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित याचिकाओं पर सुनवाई जारी रहेगी।
इससे पहले 19 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि चल रहे शैक्षणिक सत्र के बीच कानून लागू करना व्यावहारिक रूप से कठिन होगा और सरकार को इसे अप्रैल 2026 तक टालने पर विचार करने की सलाह दी थी।
कानून की प्रमुख विशेषताएं
प्रस्तावित कानून के तहत फीस निर्धारण के लिए बहु-स्तरीय समिति प्रणाली बनाई जाएगी, जिसमें अभिभावक, शिक्षक, स्कूल प्रबंधन और सरकारी अधिकारी शामिल होंगे। स्कूल स्तर की समितियों को हर वर्ष 15 जुलाई तक फीस प्रस्तावों पर निर्णय लेना होगा, जबकि जिला स्तर पर समीक्षा 30 जुलाई तक पूरी करनी होगी। अंतिम निर्णय सितंबर तक लिया जाएगा।
कानून लागू होने के बाद निजी स्कूल सरकार की मंजूरी के बिना फीस नहीं बढ़ा सकेंगे। नियमों का उल्लंघन करने पर 1 लाख से 5 लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है, जबकि बार-बार उल्लंघन की स्थिति में यह राशि 10 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। निर्धारित समय में अतिरिक्त वसूली गई फीस वापस न करने पर हर 20 दिन में जुर्माना दोगुना होता जाएगा। लगातार नियम तोड़ने वाले स्कूल फीस बढ़ाने का अधिकार भी खो सकते हैं।
यह कानून दिल्ली के लगभग 1700 गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों पर लागू होगा। सरकार का कहना है कि कानून का उद्देश्य फीस वृद्धि प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना और अभिभावकों को राहत प्रदान करना है।