Sunday, May 24

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पुलिस पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाने वाले डॉक्टर को कोर्ट का संरक्षण कड़कड़डूमा अदालत ने डीसीपी ईस्ट को दिए सुरक्षा के निर्देश, शिकायत वापस लेने का दबाव

नई दिल्ली।
दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों पर रिश्वत मांगने का गंभीर आरोप लगाने वाले डॉक्टर को सुरक्षा मुहैया कराने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि शिकायतकर्ता को डराया-धमकाया जा रहा है तो यह न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप भी माना जाएगा।

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यह आदेश ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास सतेंद्र पाल सिंह ने डॉ. जुनैद अकरम की याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। शिकायतकर्ता ने अदालत को बताया कि उसे लगातार अज्ञात नंबर से फोन कॉल आ रहे हैं, जिनमें पुलिस के खिलाफ दर्ज कराई गई रिश्वतखोरी की शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है।

शिकायत वापस लेने के लिए दी जा रही धमकियां

अदालत के समक्ष प्रस्तुत अर्जी में कहा गया कि कॉल करने वाला व्यक्ति डॉक्टर को या तो शिकायत वापस लेने या फिर डीसीपी ईस्ट के समक्ष लिखित अंडरटेकिंग देने के लिए मजबूर कर रहा है। शिकायतकर्ता के मना करने पर उसे खुलेआम धमकी दी गई कि “उसे देख लिया जाएगा।”

न्याय प्रशासन में दखल की आशंका

मजिस्ट्रेट ने आदेश में कहा कि यदि लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न्याय प्रशासन में गंभीर दखलअंदाजी का मामला है। खासकर तब, जब आरोप स्वयं पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हों और निष्पक्ष जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा हो।

सुरक्षा देना पुलिस की जिम्मेदारी

अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों, जिनमें कॉल के स्क्रीनशॉट और मामले का पिछला संदर्भ शामिल है, को देखते हुए शिकायतकर्ता को किसी भी तरह की धमकी या उत्पीड़न से बचाना आवश्यक है।

डीसीपी को तत्काल सुरक्षा के निर्देश

अदालत ने संबंधित डीसीपी को तत्काल प्रभाव से डॉक्टर को सुरक्षा उपलब्ध कराने का आदेश दिया। मामले में शिकायतकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता देवाशीष महर्षि ने बताया कि डॉक्टर ने पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत अर्जी दाखिल की थी, जिसमें लक्ष्मी नगर थाने में तैनात कुछ पुलिस अधिकारियों पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया था।

इस अर्जी पर अदालत ने 21 जनवरी को डीसीपी को एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) दाखिल करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद ही शिकायतकर्ता को धमकी भरे फोन कॉल आने लगे।

अदालत के इस आदेश को पुलिस जवाबदेही और शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

 

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