
नई दिल्ली: दिल्ली में रोजाना लोगों के लापता होने की घटनाएं सामने आ रही हैं, जिनमें नवजात से लेकर बुजुर्ग तक शामिल हैं। कुछ मामलों में परिवारों को राहत मिलती है, जबकि कई परिवारों के लिए यह गम जीवनभर बना रहता है। इसी पर फोकस करते हुए एनबीटी की यह विशेष रिपोर्ट पेश है।
जवानी की तरफ बढ़ते कदम, शारीरिक और मानसिक बदलाव, और सोशल मीडिया के लगातार प्रभाव के चलते 12 से 18 साल के टीनएजर्स बहकाव के शिकार हो रहे हैं। वर्चुअल दुनिया में ऑनलाइन दोस्ती, भावनात्मक ब्लैकमेलिंग और झूठे वादों के चलते कई युवा गलती कर बैठते हैं।
बदलाव की आहट
PSRI हॉस्पिटल के सायकायट्रिस्ट डॉ. परमजीत सिंह का कहना है कि यह उम्र शारीरिक और मानसिक बदलाव का फेज है। शरीर में बदलाव के साथ उत्तेजना और गुस्से की प्रवृत्ति बढ़ती है। इस समय युवा न तो पूरी तरह वयस्क होते हैं और न ही बच्चे। परिवार और समाज से मेल न खाने वाले व्यवहार के चलते उन्हें लगता है कि उन्हें कोई समझता नहीं। इस दौर में फोन और सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रभाव होता है और नशा या बहकावे का खतरा रहता है। ऐसे में माता-पिता की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।
लड़कियां अधिक हो रही हैं लापता
दिल्ली पुलिस के 11 साल के रिकॉर्ड (2015-2025) के अनुसार 12 से 18 साल के कुल 56,119 टीनएजर्स घर से लापता हुए। इनमें लड़कों की संख्या 15,832 रही, जबकि लड़कियों की संख्या 40,287 थी। यानी कुल लापता मामलों में लगभग 72 फीसदी लड़कियां शामिल हैं। राहत की बात यह है कि इनमें से 50,168 को ट्रेस कर लिया गया, जिसमें 14,462 लड़के और 35,706 लड़कियां शामिल हैं। हालांकि 5,951 लड़के और लड़कियों का आज तक कोई सुराग नहीं मिला।
सोशल मीडिया का गहरा प्रभाव
पुलिस की जांच में सामने आया कि कई लापता युवाओं को ऑनलाइन दोस्ती, भावनात्मक ब्लैकमेलिंग और शादी के झूठे वादे में बहकाया गया। विश्लेषण में पाया गया कि 35% मामले भावनात्मक/लव अफेयर, 30% सोशल मीडिया और ऑनलाइन संपर्क, और 25% घरेलू तनाव और पाबंदियों से जुड़े थे। केवल 10% मानसिक रूप से कमजोर लड़के-लड़कियां परिवार की लापरवाही के कारण भटक गए।
मिडल क्लास लड़कियां ज्यादा शिकार
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, ज्यादातर मामलों में पहले दोस्ती, फिर सहानुभूति और आखिर में शादी या बेहतर जिंदगी का झांसा दिया जाता है। ये तीन कारण 85% लड़कियों के लापता होने के मामलों में सामने आए। मिडल क्लास की लड़कियां इस बहकावे की सबसे बड़ी शिकार बन रही हैं। माता-पिता की व्यस्तता, ऑनलाइन क्लास और फोन का अत्यधिक उपयोग इसके प्रमुख कारण हैं।
पुलिस और विशेषज्ञों की सलाह
विशेषज्ञों का कहना है कि टीनएजर्स के साथ खुलकर संवाद करें, उनकी भावनाओं को समझें और सोशल मीडिया के सुरक्षित उपयोग के लिए मार्गदर्शन दें। माता-पिता की जागरूकता और समय पर हस्तक्षेप कई मामलों में बचाव कर सकता है।