
वॉशिंगटन/ओटावा: कनाडा का पश्चिमी प्रांत अल्बर्टा देश से अलग होने की मांग को तेज कर रहा है। इस विवादास्पद कदम ने कनाडा सरकार की चिंता बढ़ा दी है, जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अल्बर्टा की प्रधानमंत्री डेनिएल स्मिथ के घनिष्ठ संबंधों ने मामले को और पेचीदा बना दिया है।
अल्बर्टा को कनाडा का एनर्जी प्रांत भी कहा जाता है। यह तेल का सबसे बड़ा उत्पादक प्रांत है, और यहां के तेल का 84 प्रतिशत उत्पादन अल्बर्टा से होता है। राजनीतिक दृष्टिकोण से यह प्रांत कंजर्वेटिव पार्टी का गढ़ माना जाता है, जबकि शहर क्षेत्र प्रगतिशील हैं।
अल्बर्टा प्रॉस्पेरिटी प्रोजेक्ट नामक अलगाववादी संगठन ने अल्बर्टा की आजादी के लिए जनमत संग्रह कराने की मांग की है। इसके नेता अमेरिकी वित्त विभाग से 500 अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन की भी मांग कर रहे हैं। संगठन का दावा है कि ओटावा में उनके हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होता और संघीय सरकार की नीतियों से अल्बर्टा का तेल उद्योग प्रभावित हो रहा है।
इससे पहले, कनाडा ने खालिस्तानियों को पालने और भारत के खिलाफ उनके गतिविधियों की वजह से विवादों का सामना किया है। भारत ने कई बार कनाडा से खालिस्तानियों पर कार्रवाई की मांग की, लेकिन कनाडाई सरकार ने इसे खारिज किया। याद दिलाया जा सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर को लेकर भी विवादित रुख अपनाया था।
अल्बर्टा की प्रधानमंत्री डेनिएल स्मिथ और ट्रंप के बीच दोस्ताना संबंध पिछले साल और गहरे हुए जब स्मिथ ने ट्रंप के निजी आवास मार-ए-लागो का दौरा किया। इसके बाद ट्रंप ने अल्बर्टा की आजादी की मांग को राजनीतिक समर्थन देने की चर्चा तेज कर दी।
अल्बर्टा के अलगाववादी समूहों का आरोप है कि पूर्वी कनाडा के अधिक आबादी वाले प्रांत उनके हितों को दबा रहे हैं। उनका कहना है कि संघीय सरकार की जलवायु परिवर्तन नीतियों से उनके तेल उद्योग पर असर पड़ रहा है, और वे जितना टैक्स देते हैं, उतना फायदा प्रांत को नहीं मिलता। अप्रैल 2025 में अल्बर्टा विधानमंडल ने एक कानून पास किया, जिससे जनमत संग्रह कराना आसान हो गया।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ट्रंप अल्बर्टा के इस कदम का राजनीतिक समर्थन करते हैं, तो कनाडा की एकता के लिए यह चुनौतीपूर्ण स्थिति बन सकती है।