
विदेश में नौकरी और बेहतर जीवन की चाह में हर साल लाखों भारतीय यूरोप और अमेरिका का रुख करते हैं। बेहतर सैलरी, शानदार वर्क-लाइफ बैलेंस और सुरक्षित भविष्य का सपना लेकर जाने वाले कई लोग आर्थिक रूप से सफल भी हो जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जो तमाम उपलब्धियों के बावजूद भीतर से खुद को अधूरा महसूस करते हैं। यूरोप में काम कर चुके एक भारतीय टेक प्रोफेशनल की कहानी इसी सच्चाई को सामने लाती है।
यूरोप के वर्क-लाइफ बैलेंस के लिए मशहूर देश नीदरलैंड में करीब 30 साल तक काम करने वाले एक 59 वर्षीय भारतीय टेक वर्कर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर अपनी आपबीती साझा की है। उसने अपनी पोस्ट का शीर्षक रखा— “यूरोप में आईटी सेक्टर में तीन दशकों के अनुभव ने मेरे भीतर एक खालीपन छोड़ दिया।” इस पोस्ट में उसने विदेश में नौकरी की उस हकीकत को बयान किया है, जो अक्सर चमक-दमक के पीछे छिपी रह जाती है।
30 साल में 15 कंपनियों में किया काम
भारतीय टेक प्रोफेशनल ने बताया कि उसने नीदरलैंड में अपने पूरे करियर के दौरान 15 अलग-अलग कंपनियों में काम किया। इस दौरान वह प्रोग्रामर और आर्किटेक्ट से लेकर सीनियर मैनेजमेंट जैसे पदों तक पहुंचा। उसने बैंकिंग, टेक्नोलॉजी, सेल्स, फाइनेंस और मार्केटिंग जैसे कई क्षेत्रों में अनुभव हासिल किया।
अपने आर्थिक हालात के बारे में उसने लिखा कि उसकी कुल संपत्ति करीब 40 लाख अमेरिकी डॉलर (लगभग 33 करोड़ रुपये) है। वह पूरी तरह कर्जमुक्त है, यूरोपीय संघ की नागरिकता रखता है और आर्थिक रूप से एक आरामदायक जीवन जी रहा है।
रिश्तों की कमी का मलाल
हालांकि, इतनी सफलता के बावजूद भारतीय प्रोफेशनल को अपनी निजी जिंदगी में सबसे बड़ा अफसोस स्थायी रिश्तों की कमी का है। उसने लिखा कि ऑफिस में बनी दोस्तियां अक्सर काम तक ही सीमित रहती हैं। कंपनी बदलने या नौकरी छोड़ने के बाद पुराने सहकर्मी शायद ही संपर्क में रहते हैं।
उसने कहा, “मैंने रिश्ते निभाने की पूरी कोशिश की और इसमें समय व ऊर्जा भी लगाई, लेकिन मैंने यह सीखा कि ऑफिस की दोस्तियां नौकरी के साथ ही खत्म हो जाती हैं।”
ऑफिस कल्चर की सच्चाई
भारतीय वर्कर ने नीदरलैंड के ऑफिस कल्चर को ऊपर से बेहद दोस्ताना बताया। उसके मुताबिक, सहकर्मी कंपनी की ड्रिंक पार्टियों में निजी बातें साझा करते थे—अपने बच्चों, पालतू जानवरों और निजी जीवन के किस्से भी सुनाते थे। लेकिन यह अपनापन अक्सर सतही साबित होता था।
उसने लिखा कि नौकरी बदलते ही वही लोग अचानक संपर्क से बाहर हो जाते थे और फोन उठाना तक बंद कर देते थे।
सफलता के बाद भी अधूरापन
अपने अनुभव को समेटते हुए भारतीय टेक प्रोफेशनल ने लिखा कि आर्थिक और करियर की ऊंचाइयों तक पहुंचने के बावजूद उसके भीतर एक ऐसा खालीपन रह गया है, जिसे शायद कभी भरा नहीं जा सकेगा।
यह कहानी विदेश में नौकरी के सपने देखने वाले युवाओं के लिए एक अहम सबक है कि केवल पैसा और करियर ही खुशहाल जीवन की गारंटी नहीं होते, रिश्ते और भावनात्मक जुड़ाव भी उतने ही जरूरी हैं।