Thursday, January 29

कच्ची उम्र में प्यार-दुलार की कमी, टूटता बचपन और छूटता घर घर छोड़ने को मजबूर हो रहे 8 से 12 साल के बच्चे, चौंकाते हैं पुलिस के आंकड़े

नई दिल्ली।
आठ से बारह वर्ष की उम्र—जिसे बचपन की सबसे संवेदनशील अवस्था माना जाता है—आज उपेक्षा, दबाव और भावनात्मक दूरी के बोझ तले दबती जा रही है। इसी का नतीजा है कि इस नाजुक उम्र में बच्चे घर छोड़ने जैसा कठोर कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं। दिल्ली पुलिस के आंकड़े इस कड़वी सच्चाई की गवाही देते हैं।

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पिछले 11 वर्षों में 8 से 12 वर्ष की आयु के 6,555 बच्चे लापता हुए, जिनमें से 6,166 बच्चों को खोज लिया गया, लेकिन अब भी 389 बच्चे अपने परिवारों से दूर हैं। इनमें 257 लड़के और 132 लड़कियां शामिल हैं।

लड़कों की संख्या अधिक

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, इस आयु वर्ग में लापता होने वाले बच्चों में लड़कों की संख्या कहीं अधिक है। बीते 11 वर्षों में 4,547 लड़के और 2,008 लड़कियां घर से गायब हुईं। यह अनुपात लगभग हर साल बना रहा।

2025 में सबसे ज्यादा अनट्रेस बच्चे

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 2025 में 82 बच्चे अब तक नहीं मिल सके, जबकि 2024 में यह संख्या 77 रही। हालांकि राहत की बात यह है कि कुल मिलाकर बच्चों के लापता होने का आंकड़ा घटा है—
2015 में जहां 915 बच्चे गायब हुए थे, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर 444 रह गई।

पढ़ाई का दबाव और भावनात्मक उपेक्षा बनी वजह

गुमशुदा बच्चों की तलाश में जुटे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार, जब इन बच्चों से बातचीत की गई तो अधिकतर ने पढ़ाई के अत्यधिक दबाव को घर छोड़ने की सबसे बड़ी वजह बताया।
कम अंक आने पर डांट-फटकार, दूसरों से तुलना, और कमतर आंके जाने से बच्चों का आत्मविश्वास टूट गया।

कई मामलों में सौतेले माता-पिता की उपेक्षा और भावनात्मक दूरी भी सामने आई। बच्चों ने स्वीकार किया कि उनके पास खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी, लेकिन प्यार, अपनापन और सुनने वाला कोई नहीं था

जबरन थोपी गई गतिविधियां भी बनीं बोझ

पूर्व एसीपी सुरेंद्र कुमार गुलिया के अनुसार, लगभग 85 प्रतिशत मामलों में बच्चों पर पढ़ाई के साथ-साथ जबरन थोपी गई एक्स्ट्रा-करिकुलर एक्टिविटीज का दबाव था।
बच्चों की रुचि जाने बिना उन पर फैसले थोपे गए, जिससे वे भीतर ही भीतर टूटते चले गए और घर छोड़ने का रास्ता चुन लिया।

मातापिता बनें रोल मॉडल

प्रसिद्ध क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. अरुणा बूटा का कहना है कि माता-पिता के व्यवहार का बच्चों की मानसिक स्थिति पर गहरा असर पड़ता है।
बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। यदि माता-पिता खुद अपने आचरण में विरोधाभास रखते हैं, तो उसका नकारात्मक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि घर का माहौल सकारात्मक होना चाहिए, बच्चों के साथ समय बिताना और उन्हें भावनात्मक सुरक्षा देना बेहद जरूरी है, ताकि वे कभी खुद को अकेला न महसूस करें।

 

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