Friday, January 30

गहलोत राज के ‘ऑनर किलिंग’ बिल पर राज्यपाल का ‘ब्रेक’, अब BNS बनेगा ढाल, पुराना कानून डस्टबिन में!

जयपुर: राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर ‘राजभवन बनाम पुरानी सरकार’ का टकराव देखने को मिला है। राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार के 2019 में पास किए गए ‘ऑनर किलिंग बिल’ को वापस लौटा दिया है। इस कदम ने बजट सत्र के पहले ही दिन विधानसभा में सियासी हलचल पैदा कर दी।

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क्यों लौटाया गया बिल?
राज्य सरकार के अनुसार, जिस समय यह बिल बनाया गया था, तब देश में IPC और CrPC प्रभावी थे। अब देश में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 लागू हो चुकी है। BNS की धारा 103 ऑनर किलिंग जैसे जघन्य अपराधों से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम है। इसके तहत दोषियों को मौत की सजा या आजीवन कारावास का प्रावधान है, इसलिए राज्य स्तरीय अलग कानून की आवश्यकता नहीं समझी गई।

गहलोत सरकार का उद्देश्य:
साल 2017 में हुए पहलू खान मामले जैसी घटनाओं के बाद गहलोत सरकार ने लिंचिंग और ऑनर किलिंग रोकने के लिए यह सख्त कानून लाने का प्रयास किया था। बिल में अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों को धमकाने वाली खाप पंचायतों और बहिष्कार करने वालों पर नकेल कसने का प्रावधान था। दोषियों के लिए आजीवन जेल और 5 लाख रुपये जुर्माने जैसी कठोर सजा का प्रावधान भी शामिल था।

पुरानी फाइलों पर ‘रिटर्न’ का ठप्पा:
राज्यपाल द्वारा पिछली सरकार के बिल लौटाना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले मब लिंचिंग बिल 2019, तीन कृषि कानून और वसुंधरा राजे के समय का धर्म की स्वतंत्रता विधेयक भी वापस भेजे जा चुके हैं। हाल ही में भजनलाल सरकार ने नया ‘राजस्थान गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध विधेयक, 2025’ पारित कर स्पष्ट कर दिया कि अब राज्य अपराधों से निपटने के लिए केंद्र के नए कानूनों और संहिताओं पर भरोसा करेगा।

राज्यपाल के इस कदम से साफ है कि राजस्थान में अब पुरानी राज्य स्तरीय कानूनों की बजाय केंद्र की नई संहिता (BNS) ही अपराधों से निपटने का ढाल बनेगी।

 

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