
नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट इतिहास में 28 जनवरी का दिन एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसे टीम इंडिया कभी भूल नहीं सकती। ऑस्ट्रेलिया दौरे पर वर्ष 2011–12 की टेस्ट सीरीज का यह दिन भारत के लिए बेहद निराशाजनक साबित हुआ, जब कंगारू टीम ने चौथे और अंतिम टेस्ट में भारत को करारी शिकस्त देकर सीरीज में 4–0 से क्लीन स्वीप किया।
एडिलेड ओवल में खेला गया यह मुकाबला भारत की विदेशी धरती पर लगातार आठवीं टेस्ट हार था, जिसने टीम के प्रदर्शन, रणनीति और भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।
पोंटिंग और क्लार्क का कहर
मैच की शुरुआत से ही ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों ने भारतीय गेंदबाजों पर दबदबा बना लिया। अनुभवी रिकी पोंटिंग और कप्तान माइकल क्लार्क ने ऐतिहासिक पारियां खेलते हुए भारतीय आक्रमण की धज्जियां उड़ा दीं।
पोंटिंग ने 221 रन, जबकि क्लार्क ने 210 रन की शानदार दोहरी शतकीय पारियां खेलीं। एक चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि इन दोनों का संयुक्त स्कोर भारत की दोनों पारियों के कुल स्कोर से महज 40 रन कम था।
ऑस्ट्रेलिया ने अपनी पहली पारी 7 विकेट पर 604 रन बनाकर घोषित की, जो उस सीरीज में उनका दूसरा 600 से अधिक का स्कोर था।
कोहली की सेंचुरी, अंधेरे में उम्मीद की किरण
भारतीय बल्लेबाजी एक बार फिर दबाव में बिखर गई, लेकिन इस निराशाजनक दौर में विराट कोहली एक उजली उम्मीद बनकर उभरे। कोहली ने मुश्किल हालात में 116 रन की पारी खेलते हुए अपना पहला टेस्ट शतक जड़ा। यह पूरी सीरीज में किसी भी भारतीय बल्लेबाज द्वारा लगाया गया एकमात्र शतक था।
भारत की पहली पारी 272 रन पर सिमट गई। ऑस्ट्रेलिया ने फॉलोऑन न देते हुए दूसरी पारी 167/5 पर घोषित की और भारत के सामने 500 रनों का विशाल लक्ष्य रखा।
क्लीन स्वीप की ऐतिहासिक हार
पांचवें दिन भारतीय टीम दूसरी पारी में 201 रन पर ऑलआउट हो गई। हालांकि मैच अंतिम दिन तक चला, लेकिन इसका श्रेय भारतीय संघर्ष से अधिक ऑस्ट्रेलियाई कप्तान माइकल क्लार्क की रणनीतिक सूझबूझ को दिया गया।
इस जीत के साथ ऑस्ट्रेलिया ने 1999–2000 के बाद पहली बार भारत को टेस्ट सीरीज में व्हाइटवॉश किया। एडिलेड की यह हार न केवल एक सीरीज की समाप्ति थी, बल्कि भारतीय क्रिकेट के एक स्वर्णिम युग के ढलने का संकेत भी मानी गई, जहां दिग्गज खिलाड़ियों का संघर्ष साफ नजर आने लगा था।
यह वही दिन था, जिसे भारतीय क्रिकेट इतिहास एक शर्मनाक लेकिन सीख देने वाले अध्याय के रूप में याद करता है—और जिसे विराट कोहली शायद हमेशा याद रखेंगे।