
नई दिल्ली:
दिल्ली हाईकोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) अधिनियम से जुड़े मामलों में पीड़ितों की पहचान गोपनीय रखने को लेकर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यौन उत्पीड़न की शिकार पीड़िता का नाम, उसके माता-पिता का नाम या कोई भी ऐसी जानकारी, जिससे उसकी पहचान उजागर हो, अदालत में दाखिल किसी भी दस्तावेज, रिपोर्ट या स्टेटस रिपोर्ट में दर्ज नहीं की जानी चाहिए।
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जमानत याचिका खारिज, पुलिस को कड़ी चेतावनी
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने एक पॉक्सो मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए दिल्ली पुलिस को कड़ी हिदायत दी। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे सभी थाना प्रभारियों (SHO) और जांच अधिकारियों को कानून का सख्ती से पालन करने के आदेश जारी करें, ताकि यौन अपराधों की शिकार पीड़िताओं की पहचान किसी भी स्तर पर उजागर न हो।
स्टेटस रिपोर्ट में नाम उजागर होने पर जताई नाराजगी
हाईकोर्ट ने इस मामले में गहरी चिंता जताते हुए कहा कि जांच अधिकारी द्वारा दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में नाबालिग पीड़िता का नाम स्पष्ट रूप से लिखा गया था, जो कानून का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने संबंधित क्षेत्र के डीसीपी को निर्देश दिया कि वे अपने अधिकार क्षेत्र के सभी थानों को यह सुनिश्चित करने के सख्त निर्देश दें कि भविष्य में ऐसी कोई चूक न हो।
आदेश की प्रति पुलिस अधिकारियों को भेजने के निर्देश
कोर्ट ने आदेश दिया कि इस फैसले की एक प्रति संबंधित डीसीपी और दिल्ली पुलिस कमिश्नर को सूचना एवं अनुपालन के लिए भेजी जाए, ताकि पूरे पुलिस तंत्र में इस संबंध में जागरूकता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
क्या था पूरा मामला
हाईकोर्ट जिस मामले की सुनवाई कर रहा था, उसमें आरोप था कि वर्ष 2021 में एक व्यक्ति ने 12-13 साल की नाबालिग लड़की को झूठे बहाने से उसके घर से ले जाकर एक कमरे में बंद किया और उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। बाद में पीड़िता के परिजनों ने उसे ढूंढकर सुरक्षित निकाला।
आरोपी ने रखा बचाव पक्ष
आरोपी ने अदालत में दलील दी कि वह पीड़िता की मां के साथ सहमति से शारीरिक संबंध में था और उसी कारण उसे झूठे मामले में फंसाया गया। उसने यह भी तर्क दिया कि कोविड-19 महामारी के दौरान वर्ष 2021 में आवाजाही और सामाजिक मेलजोल सीमित था, ऐसे में अभियोजन पक्ष द्वारा बताए गए तरीके से घटना घटित होना संदिग्ध है।
निष्कर्ष:
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल कानून के सख्त पालन का संदेश देता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़ितों की गरिमा और गोपनीयता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।