
ढाका: बांग्लादेश में 12 फरवरी को प्रस्तावित आम चुनाव से पहले देश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा की घटनाएं तेज हो गई हैं। हालिया महीनों में कई हिंदुओं की हत्या और हमलों की खबरें सामने आई हैं, जिससे देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो गई है।
हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की शुरुआत अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद देखी गई थी, लेकिन चुनाव की घोषणा के बाद इन घटनाओं में तेजी आई है। दिसंबर में दीपू चंद्र दास की नृशंस हत्या ने हालात की भयावहता को उजागर किया था। कथित तौर पर पैगंबर के अपमान के आरोप में भीड़ ने उन्हें पीट-पीटकर मार डाला था।
अब बांग्लादेश के एक चुनावी उम्मीदवार ने स्वीकार किया है कि कुछ राजनीतिक ताकतें चुनावी लाभ के लिए सांप्रदायिक हिंसा को रणनीति के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, मतदाताओं को विभाजित करने के उद्देश्य से हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ सुनियोजित हिंसा भड़काई जा रही है।
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एक सांसद उम्मीदवार के वीडियो में यह स्वीकारोक्ति सामने आई है कि चुनाव जीतने के लिए हिंदू बहुल इलाकों को निशाना बनाया जा रहा है। इन हमलों को अंजाम देने वालों को कट्टरपंथी समूहों द्वारा “इस्लाम के सैनिक” कहकर महिमामंडित किया जा रहा है।
रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि कट्टरपंथी मौलवियों और स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच गठजोड़ के जरिए नफरत फैलाने की कोशिशें की जा रही हैं। कई कथित वीडियो क्लिप में भड़काऊ भाषणों के जरिए लोगों से हिंदू या गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट न देने की अपील करते हुए देखा गया है।
इस बीच, भारत में रह रही बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में भय और आतंक का माहौल बनाया जा रहा है। वहीं, अवामी लीग के पूर्व सांसद बहाउद्दीन नसीम ने फरवरी में होने वाले चुनावों को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाकर देश की बड़ी आबादी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है।
देश में बढ़ती हिंसा और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच बांग्लादेश में चुनावों की निष्पक्षता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।