
पटना: मुसहर टोली से विधानसभा तक गरीबों की आवाज बने कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को समस्तीपुर जिले के पितौंझिया (अब कर्पूरी ग्राम) में हुआ। कठिन परिस्थितियों और जातिगत भेदभाव को पार कर शिक्षित हुए कर्पूरी जी ने जीवनभर दलितों और पिछड़ों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। उनके संघर्ष और निस्वार्थ सेवा को आज भी बिहार में सामाजिक न्याय की नींव माना जाता है।
कर्पूरी ठाकुर ने अपने शुरुआती जीवन में जमींदारों की हवेलियों के बाहर खड़े होकर पढ़ाई की और 10वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा पास की। उच्च शिक्षा सीएम कॉलेज, दरभंगा में हासिल की, लेकिन 1942 के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण कॉलेज की पढ़ाई अधूरी रह गई। महात्मा गांधी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस से प्रेरित होकर उन्होंने अहिंसक संघर्ष और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभाई। 1943 में गिरफ्तारी भी हुई, लेकिन 1945 में रिहाई के बाद भी उनका संघर्ष जारी रहा।
राजनीति में कदम रखने के बाद 1957 में उन्होंने पहली बार चुनाव जीता और आगे चलकर दो बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। लेकिन कर्पूरी ठाकुर की राजनीति धन और पद के लिए नहीं, बल्कि जनता की सेवा के लिए थी। मुख्यमंत्री रहते हुए उनका कार्यालय हमेशा गरीबों और आम लोगों से भरा रहता था। अफसर भी कह उठते थे कि गरीब लोग मुख्यमंत्री के कमरे में बैठे रहते हैं। उनकी निस्वार्थ सेवा और गरीबों के प्रति प्रेम के कारण उन्हें ‘जननायक’ के रूप में याद किया जाता है।
कर्पूरी ठाकुर का जीवन गरीबों और पिछड़ों के लिए संघर्ष, समाजसेवा और न्याय का प्रतीक रहा। उनके विचार आज भी बिहार में सामाजिक न्याय और समानता के प्रेरक स्तंभ हैं।